दरअसल, पिछले दो सालों से मध्यप्रदेश में सोयाबीन उत्पादन में कमी आने से मध्यप्रदेश पिछड़ गया था। वर्ष 2022-23 में महाराष्ट्र 5.47 मिलियन टन उत्पादन के साथ प्रथम स्थान पर था और देश के कुल सोयाबीन उत्पादन में 42.12 फीसदी का योगदान था और जबकि मध्यप्रदेश 5.39 मिलियन टन के साथ दूसरे नंबर पर था। देश के कुल सोया उत्पादन में योगदान 41.50 फीसदी था। वर्ष 2021-22 में भी महाराष्ट्र 6.20 मिलियन टन उत्पादन के साथ प्रथम स्थान पर था। राज्य का देश के सोयाबीन उत्पादन में 48.7 फीसदी का योगदान था। जबकि मध्यप्रदेश 4.61 मिलियन टन के साथ दूसरे नंबर पर था। देश के कुल उत्पादन में इसका योगदान 35.78 फीसदी था। जबकि वर्ष 2020-21 में मध्यप्रदेश 5.15 मिलियन टन उत्पादन के साथ पहले स्थान पर रहा था। देश के कुल सोयाबीन उत्पादन में 45.05 फीसदी का योगदान था। इस साल महाराष्ट्र 4.6 मिलियन टन उत्पादन के साथ दूसरे नंबर पर था और राजस्थान तीसरे नंबर पर था।
पिछले वर्षों में सोयाबीन उत्पादन और क्षेत्रफल में उतार-चढ़ाव होता रहा है। सोयाबीन के क्षेत्रफल में वर्ष 2018-19 की तुलना में वर्ष 2019-20 में 14.30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। सोयाबीन क्षेत्रफल 2018-19 में 5019 हजार हेक्टेयर था, जो 2019-20 में बढ़कर 6194 हजार हेक्टेयर हो गया। इसी दौरान सोयाबीन का उत्पादन 2018-19 में 5809 हजार मीट्रिक टन था जो 2019-20 में कम होकर 3856 हज़ार मैट्रिक टन हो गया। सोया उत्पादन में 33.62 फीसदी की कमी आई।
किसान कर रहे 6000 रुपये एमएसपी की मांग
एक ओर जहां मध्यप्रदेश सोयाबीन उत्पादन में टॉप पर आ गया है। वहीं, दूसरी ओर सोयाबीन की कम कीमत को लेकर किसान विरोध कर रहे हैं। किसानों ने प्रदेश में सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य 6000 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग की है। किसानों ने एमएसपी बढ़ाने के लिए 1 सितंबर 2024 से आंदोलन शुरू कर दिया है। एसकेएम ने मध्यप्रदेश के किसानों से आह्वान किया था कि वे सभी ग्राम पंचायतों के सचिव को मुख्यमंत्री के नाम का ज्ञापन सौंपे। इसकी शुरुआत सोमवार से हो चुकी है। किसानों का ये विरोध प्रदर्शन का कार्यक्रम पूरे हफ्ते चलेगा। संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा है कि वे पंचायत स्तर पर ज्ञापन सौंपने की मुहिम चलाकर राज्य के हर किसान तक इस विषय को पहुंचा रहे हैं।