रायबरेली के अलावे बेल्लारी से चुनाव लड़ी थीं सोनिया गांधी
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इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी भी चल चुकी हैं दक्षिण चाल
दो सीटों पर चुनाव लड़ने का ट्रेंड नया नहीं है। पिछली बार नरेंद्र मोदी ने भी गुजरात की वड़ाेदरा के अलावा उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट से भी मैदान में उतरे थे और जीते भी। उन्होंने गुजरात की सीट छोड़ उत्तर प्रदेश की वाराणसी को चुना।
दक्षिण भारत का रुख करने वाले राहुल गांधी कोई पहले नेता नहीं हैं। उनसे पहले उनकी मां सोनिया गांधी और दादी इंदिरा गांधी भी दक्षिण भारत का रुख कर चुकी हैं। साल 1977 में रायबरेली से हारने के बाद इंदिरा ने चिकमंगलूर का रुख किया था। साल 1978 के उपचुनाव में वहां से जीत हासिल की थी। वहीं, सोनिया गांधी भी कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए रायबरेली के अलावा कर्नाटक के बेल्लारी से चुनाव लड़ चुकी हैं।
बेल्लारी लोकसभा सीट वैसे तो कांग्रेस का ही गढ़ रही थी और और यहां हुए 18 लोकसभा चुनावों में 15 बार कांग्रेस चुनाव जीत चुकी है। साल 1999 में सोनिया गांधी ने यहां से चुनाव लड़ा था और 56 हजार वोटों के अंतर से भाजपा उम्मीदवार सुषमा स्वराज को शिकस्त दी थी। हालांकि सोनिया ने बाद में यह सीट छोड़ दी और उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट का प्रतिनिधित्व किया। पिछले डेढ़ दशक से भाजपा यह सीट जीत रही है।
केरल के वायनाड सीट का ये है राजनीतिक गणित
2008 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आए केरल की वायनाड सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा है। एमआई शनवास दो बार से यहां के सांसद हैं और भाजपा यहां दौड़ में नहीं है। 2014 में एमआई शनवास ने सीपीआई को हराकर इस सीट पर पहली बार जीत दर्ज की थी। उन्हें तीन लाख 77 हजार 035 वोट मिले थे, जबकि सीपीआई के सत्यान मोकेरी को तीन लाख 56 हजार 165 वोट मिले। हार का अंतर काफी कम रहा था। यही कारण है कि राहुल गांधी के उम्मीदवार घोषित होते ही लेफ्ट कांग्रेस पर भड़की हुई है और विरोध कर रही है।
वायनाड में पिछले चुनाव के वोट शेयर देखें तो कांग्रेस को 41.21 फीसदी मिले थे, वहीं सीपीआई को करीब 39 फीसदी, जबकि भाजपा को महज नौ फीसदी वोट मिले थे। सीपीआई इस बार भी कड़ा मुकाबला देने वाली थी, लेकिन राहुल गांधी को उम्मीदवार उतार कर कांग्रेस ने दक्षिण चाल खेल दिया है।