। उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) लोकसभा की तीन सीटों पर चुनाव लड़ रही है।
क्षेत्रीय पार्टियों के वो उम्मीदवार जो मैदान में हैं
क्षेत्रीय पार्टियां भी मैदान में हैं। उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) लोकसभा की तीन सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पार्टी ने पौड़ी सीट से शांति भट्ट को मैदान में उतारा है तो टिहरी से जयप्रकाश उपाध्याय चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं, अल्मोड़ा सीट से उक्रांद के टिकट पर केएल आर्य चुनाव लड़ रहे हैं। सीपीआई (एमल) से नैनीताल सीट पर डॉक्टर कैलाश पांडे चुनाव मैदान में हैं। इसके अलावा निर्दलीय तौर पर गौ कथाकार गोपाल मणि टिहरी सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी ने अल्मोड़ा से एडवोकेट विमला आर्या को मैदान में उतारा है।
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क्या है मुख्य मुद्दा?
वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी कहते हैं कि पहाड़ में इस बार चुनावी मुद्दा 'राष्ट्रवाद' है। यह पहली बार है जब स्थानीय समस्याओं को अनदेखा कर भाजपा राष्ट्रवाद एवं मोदी के सहारे सूबे में चुनाव लड़ रही है। पलायन सभी राजनीतिक पार्टियों के चुनावी मुद्दे से एकदम छिटका हुआ है क्योंकि किसी के पास इसका कोई स्थाई समाधान नहीं है। इसके अलावा पार्टियां गैरसैण को राजधानी बनाने की बात तो कह रहे हैं लेकिन यह सिर्फ चुनावी वादा है।
चारु तिवारी कहते हैं विकास के नाम पर उत्तराखंड में पिछले 18 सालों में सिर्फ शराब की दुकानें खुली हैं। उत्तराखंड के पड़ोसी सूबे हिमाचल को बने 63 साल हो गए और सूबे में छह मुख्यमंत्री हुए जबकि उत्तराखंड में मुख्यमंत्री ही बदले बस। तिवारी कहते हैं- पहाड़ में इस दौरान दो चीजें सबसे ज्यादा पैदा हुईं-सुअर और बंदर, ऐसे में पहाड़ को ऐसी नीति-नियंता सरकार चाहिए जो सुअर और बंदरों को भगा सके।
उत्तराखंड जबरदस्त पलायन की चपेट में है। सूबे के 13 में से 11 जिलों में पलायन हुआ है।
चारु तिवारी कहते हैं कि भाजपा एवं कांग्रेस दोनों ही पार्टियां उत्तराखंड की जमीनी स्थिति से अनजान हैं। और न ही इन पार्टियों के पास ऐसी राजनीतिक इच्छाशक्ति है जो पहाड़ों में विकास कर सके और पलायन को रोक सके। स्थिति बेहद खराब है। 3 हजार से ज्यादा गांव खाली हो गए हैं। पहाड़ में 18 सालों में गांव-गांव सड़कें तो पहुंची हैं लेकिन हर सड़क ने गांव से दिल्ली पटक दिया। ऐसी कोई सड़क नहीं बनी जिसने दिल्ली से गांव पहुंचाया हो। वह कहते हैं कि इन सड़कों के जरिए पहाड़ में माफिया गए और जल, जगंल एवं जमीन की लूट शुरू हो गई। चारु तिवारी कहते हैं कि राजनीति में शब्दों की शालीनता एकदम धूमिल हो गई है। भगत सिंह कोश्यारी एवं हरीश रावत के बयान इसका उदाहरण हैं। वह कहते हैं कि उत्तराखंड को भी हिमाचल की ही तरह धारा 118 चाहिए ताकि यहां जमीनों की खरीद-फरोक्त पर रोक लग सकें।
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उत्तराखंड जबरदस्त पलायन की चपेट में है। सूबे के 13 में से 11 जिलों में पलायन हुआ है। शहरी इलाकों में तकरीबन 9 फीसदी और ग्रामीण इलाकों में तकरीबन 19 फीसदी पलायन हुआ है। 2001 से 2011 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों की 5.1 प्रतिशत आबादी घटी है। पहले कुल जनसंख्या का ज्यादातर अनुपात गांवों में रहता था, लेकिन पलायन की वजह से गांव के गांव खाली हो गए हैं। सबसे ज्यादा चुनौती दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों को लेकर है। किसी भी राजनीतिक पार्टी का न ही इस तरफ ध्यान जाता है और न ही पहाड़ के इन गांवों को लेकर किसी पार्टी के पास सही रोड मैप है। पलायन मुद्दा होने के साथ ही रोजगार और नशामुक्ति भी उत्तराखंड का मुख्य मुद्दा है। स्वास्थ्य और शिक्षा भी सबसे अहम मुद्दा है। चारु तिवारी कहते हैं, इस समय की राजनीति ने सारे मुद्दों को गौण कर दिया है और विकास की जगह राष्ट्रवाद एवं देशभक्ति ही सबसे अहम मुद्दा रह गया है। इस बात का उदाहरण पहाड़ी गांवों में भी देखने को मिल रहा है। क्षेत्रीय पार्टियां असल मुद्दे तो उठाती हैं लेकिन जनता के बीच इनकी स्वीकार्यता सबसे बड़ी चुनौती है।