क्या कोई खेल भी कहीं चुनावी मुद्दा हो सकता है? जी हां, महाराष्ट्र में लोकसभा चुनावों में पुणे के ग्रामीण इलाकों में बैलगाड़ा शेरियन एक ऐसा खेल है जिसे यहां के ग्रामीण चुनावी मुद्दे के रूप में नेताओं के सामने उठा रहे हैं। इस खेल को करीब 15 साल पहले प्रतिबंधित कर दिया गया था, जिसे दोबारा शुरू कराने की मांग ग्रामीण लंबे समय से कर रहे हैं। तब से कई चुनाव हो चुके हैं और हर बार इस इलाके के किसान इसे उठाते हैं, उन्हें नेताओं की तरफ से भरोसा भी मिलता है लेकिन मांग पूरी नहीं हुई।
बैलगाड़ा शेरियन के नाम से जाना जाने वाला यह खेल तमिलनाडु के जलाईकट्टू से मिलता जुलता है। जहां जलाईकट्टू में एक बिगड़ैल खूंखार सांड़ (बैल) को दौड़ाते हुए उसे काबू करते हैं और कई बार इस खेल में कभी बैल की तो कभी उसे काबू करने वाले की मौत तक हो जाती है। जबकि बैलगाड़ा शेरियन में खुली सड़क या मैदान में लोग अपने अपने बैलों की दौड़ कराते हैं। एक निश्चित दूरी तक एक एक बैल को अकेले दौड़ना होता है। भीड़ शोर मचाकर बैल को भड़काती है और बैल दौड़ता है। इसी तरह फिर दूसरे बैलो को दौड़ाया जाता है। बाद में बैलों ने जितने समय में दूरी तय की है उसके हिसाब से उन्हें विजेता उप विजेता घोषित किया जाता है।
महाराष्ट्र खासकर मराठवाड़ा क्षेत्र में यह खेल गांवों में किसानों के बीच बेहद लोकप्रिय रहा है। लेकिन करीब 15 साल पहले पशुप्रेमी संगठनों ने इसे बैलों पर अत्याचार बताते हुए इसके खिलाफ आवाज उठाई और इसे अदालत के आदेश पर बंद करा दिया गया। गांव वाले इसे फिर से शुरु कराना चाहते हैं और इसके लिए हर राजनीतिक दल हर चुनाव में उन्हें भरोसा भी देता है। तालेघर गांव में अनिल कहते हैं कि इस बार भी गांवों के लोग कांग्रेस एनसीपी और भाजपा शिवसेना के उम्मीदवारों से यह मांग कर रहे हैं। दोनों पक्ष उन्हें भरोसा भी दे रहे हैं।
गांव वालों का कहना है कि इस खेल के बंद होने के बाद से इस इलाके में बैलों की मांग घट गई है और इसका असर उनकी नस्ल पर भी पड़ रहा है। पहले किसान इस खेल में शामिल होने के लिए बैलों को पालते थे और उनकी अच्छी खिलाई पिलाई और देखरेख करते थे। क्योंकि इससे उन्हें न सिर्फ इलाके में मान सम्मान मिलता था बल्कि दौड़ जीतने वाले को इनाम के रूप में पैसे भी मिलते थे। लेकिन अब यह स बंद हो गया है।