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Exclusive: एलटीटीई की तर्ज पर अब नक्सली इलाकों में तैयार किए जा रहे हैं बच्चों के आत्मघाती दस्ते

Tue, 21 Aug 2018 05:22 AM IST
Trainee Trainee जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Amar Ujala
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1980-90 के दौरान श्रीलंका में सक्रिय रहा प्रमुख उग्रवादी संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) की तर्ज पर अब भारत के नक्सली समूह भी बच्चों के आत्मघाती दस्ते तैयार करने लगे हैं। विभिन्न राज्यों में लापता हुए बच्चों को नक्सली इलाकों में पहुंचाया जा रहा है। वहां पर इन्हें हथियारों के प्रशिक्षण से लेकर छोटे-मोटे बम बनाने, हैंड ग्रेनेड का इस्तेमाल और आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) ब्लास्ट की जानकारी भी दी जाती है। लापता हुए बच्चों को जबरन असामाजिक सशस्त्र गुटों में भर्ती किया जा रहा है, यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) की रिपोर्ट में आने के अलावा केंद्र सरकार के ध्यान में भी है। 

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बता दें कि देश में हर साल लापता बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है। मौजूदा समय में औसतन एक लाख बच्चे हर साल लापता हो जाते हैं। अगर लापता बच्चों के मिलने का आंकड़ा देखें तो वह मुश्किल से पचास फीसदी तक ही पहुंच पाता है। बच्चों से विभिन्न तरह के अपराध कराना, ये मामले तो कई सालों से चल रहे हैं, लड़कियों को वेश्यालयों में भेजने की बातें भी अब पुरानी हो चली हैं। लापता हुए बच्चों के साथ अब एक नया और खतरनाक खेल शुरू हो गया है।

जिस तरह से श्रीलंका में एलटीटीई ने बच्चों के हाथ में हथियार, पेट पर विस्फोटक सामग्री और उनके गले में सायनाइड के कैप्सूल डालकर उन्हें आत्मघाती दस्तों का हिस्सा बना दिया था, अब हमारे देश में नक्सली भी उसी राह पर चल पड़े हैं। 
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लड़के-लड़की के गायब होने की संख्या (पिछले सालों का आंकड़ा भी शामिल) 

बच्चों की दी जा रही ब्लास्ट की ट्रेनिंग

लापता हुए बच्चों को जबरन वे अपने गुटों में शामिल कर रहे हैं। उन्हें सभी तरह के हथियारों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। आईईडी ब्लास्ट कैसे तैयार करना है और उसे कैसे चलाना है, यह सब जानकारी बच्चों को दी जा रही है। वजह, बच्चे किसी भी जगह पर वहां के लोगों के बीच आसानी से खुद को एडजस्ट कर लेते हैं। जब नक्सली समूहों द्वारा तैयार बच्चे किसी इलाके में अपनी पहचान बना लेते हैं तो उन्हें आईईडी ब्लास्ट की जिम्मेदारी दे दी जाती है। 

ब्लास्ट के बाद बच्चे भागते नहीं

बच्चों को दी जा रही इस ट्रेनिंग के बारे में छत्तीसगढ़ और झारखंड की कोबरा विंग में काम कर चुके सीआरपीएफ के एक कमांडेंट का कहना है कि नक्सली अब बच्चों को ढाल बनाकर अब आगे की लड़ाई लड़ने की रणनीति बना रहे हैं। चूंकि बच्चों पर किसी को शक नहीं होता। तीन-चार छोटी घटनाओं में देखा गया है कि आईईडी ब्लास्ट के बाद बच्चे भागते नहीं हैं, वे जंगल में पेड़ काटने या पशु चराने में व्यस्त हो जाते हैं। ऐसा वे सुरक्षा बलों की आँखों में धूल झोंकने के लिए करते हैं। इसी रणनीति के तहत कुछ बच्चे सड़क बनाने का कार्य या कहीं कोई दूसरा निर्माण कार्य स्थल, उसकी ओर खिसक लेते हैं। ये ऐसा इसलिए करते हैं ताकि किसी की पहचान में न आ सकें।


 

बच्चों को सिखाते हैं लाल सलाम

कुछ तस्वीरें ऐसी भी मिली हैं जिनमें बच्चे एके-47, इन्सास, कार्बाइन, पिस्तौल और सामान्य बंदूक चलाते हुए दिख रहे हैं। बच्चे होने के कारण लोकल पुलिस भी इनकी ज्यादा जांच पड़ताल नहीं करती, लेकिन अब इस तरह की घटनाएं सामने आने लगी हैं तो अर्धसैनिक बलों के अलावा पुलिस को भी इस बाबत चौकस कर दिया गया है। देश में जो बच्चे गायब हो जाते हैं, नक्सली समूह उन्हें आसाने से अपने इलाके में ले आते हैं। कर्नाटक, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, जम्मू और कश्मीर और बिहार आदि राज्यों से लापता बच्चों को नक्सली अपने समूह में शामिल कर लेते हैं। बच्चों के दिमाग में लाल सलाम जैसी बातें भी ठूसी जाती हैं। 

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सरकार ने भी माना बच्चों का हो रहा है इस्तेमाल

इस बाबत पिछले दिनों गृह मंत्रालय में गृह राज्यमंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने संसद में दिए अपने एक बयान में कहा था, सरकार को इस बात की जानकारी है कि देश में कुछ आतंकवादी व उग्रवादी समूह सशस्त्र काडर के रूप में बच्चों को जबरदस्ती अपने समूहों में भर्ती कर रहे हैं। सरकार ने इस तरह की गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए कार्रवाई भी की है। केंद्रीय सुरक्षा बलों के अलावा संबंधित राज्य सरकारों के पुलिस बलों से भी इस बाबत कठोर कार्रवाई करने के लिए कहा गया है। बच्चों की देखभाल तथा संरक्षण अधिनियम-2015 को अधिनियमित कर दिया गया है। आपराधिक गतिविधियों या दूसरे गैर कानूनी मामलों में बच्चों के शामिल करने पर कड़ा दंड देने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है। 

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