तीरथ सिंह रावत के साथ त्रिवेंद्र सिंह रावत
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अगर कोरोना महामारी ना आई होती और देश में उसके चलते लॉकडाउन ना लगा होता, तो त्रिवेंद्र सिंह रावत की कुर्सी पिछले साल ही चली गई होती। दरअसल भाजपा आलाकमान के पास त्रिवेंद्र सिंह रावत का बतौर मुख्यमंत्री एक साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद से ही लगातार शिकायतें आने लगी थीं। शुरुआती दौर में यह माना गया कि विरोधी सक्रिय हैं, लेकिन जब तथ्यों के साथ मंत्रियों से लेकर कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों ने उनकी अनदेखी करने की लगातार शिकायतें की, तो त्रिवेंद्र सिंह रावत की कुर्सी के बदलने की भूमिका बनने लगी।
साल 2020 में महीना जनवरी का था और उत्तराखंड सरकार के एक मंत्री दोपहर में भारतीय जनता पार्टी के संस्थापकों में से एक कद्दावर नेता के पास बैठे हुए थे। मंत्री जी अपना दुखड़ा उन नेता के सामने जो सुना रहे थे, कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत उनकी नहीं सुन रहे हैं। मंत्री की यह भी शिकायत थी कि उनके ही विभाग के बड़े अधिकारी को बगैर उनकी अनुमति के बदल दिया गया। ऐसे एक मंत्री नहीं बल्कि तीन मंत्री नवंबर 2019 से लेकर जनवरी 2020 तक भाजपा के अलग-अलग बड़े नेताओं के दरबार में हाजिरी लगाकर अपना दुखड़ा सुना चुके थे।
भारतीय जनता पार्टी के सूत्रों के मुताबिक दर्जनों शिकायतों के आने के बाद जब उसकी पड़ताल की गई तो तथ्य सच पाए गए। सूत्र बताते हैं कि योजना यही थी कि मार्च से अप्रैल के बीच में उत्तराखंड में फेरबदल कर दिया जाए। लेकिन कोरोना से त्रिवेंद्र सिंह रावत को इसलिए एक मौका मिला कि लॉकडाउन में बहुत ज्यादा फेरबदल बेहतर नहीं था। क्योंकि केंद्र सरकार की प्राथमिकता राजनीति से ज्यादा बीमारी को रोकने और लोगों को ज्यादा से ज्यादा जागरूक कर बचाव करने की थी। यही वजह रही कि रावत को लॉकडाउन के दौरान एक जीवनदान मिला और रावत की कुर्सी लॉकडाउन के चलते ही बच गई।
लॉकडाउन के दौरान त्रिवेंद्र सिंह रावत की कुर्सी तो बच गई, लेकिन जब बिहार में चुनाव हुए उस वक्त भी उत्तराखंड में कुर्सी बदलने की हलचल अंदर खाने शुरू हुई। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री रावत अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे। वहीं हालात इसी साल जनवरी से फिर से बिगड़ने लगे। भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता जिनकी नजर हमेशा उत्तराखंड की राजनीति पर लगी रहती हैं, उनके पास लगातार शिकायतें आ रही थीं कि रावत न सिर्फ कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज कर रहे हैं बल्कि आंदोलनकारी जो अपनी किसी मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन करते हैं उनको भी परेशान किया जाता है।
न तो उनकी सुनी जाती है और न ही उनकी समस्याओं का निदान किया जाता है। कई बार आंदोलनकारियों पर चली लाठियां भी मुख्यमंत्री की कुर्सी को हिलाने के लिए काफी रही हैं। प्रदेश भाजपा के नेताओं समेत दिल्ली से उत्तराखंड पर नजर रखने वाले जिम्मेदारों ने केंद्रीय आलाकमान को एक बार फिर से आगाह किया कि अगर वक्त पर चेहरा नहीं बदला जाएगा तो आने वाले विधानसभा के चुनाव में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को भी उनके कार्यकाल में लोगों की नाराजगी और मंत्रियों समेत विधायक और अन्य नेताओं की ओर से की जाने वाली शिकायत के बारे में लगातार आगाह किया जा रहा था। संघ और भाजपा के कुछ बड़े नेताओं से बेहतर तालमेल के चलते त्रिवेंद्र सिंह रावत शिकायतों को नजरअंदाज करते रहे। लेकिन शिकायतों का भंडार इतना ज्यादा हो गया था कि उनकी कुर्सी लाख चाहने के बाद भी नहीं बचाई जा सकी। ऐसा नहीं था कि त्रिवेंद्र सिंह रावत की कुर्सी को बचाने के लिए भारतीय जनता पार्टी के एक गुट ने मेहनत नहीं की लेकिन बात बन नहीं सकी।