संविधान में बताए गए हिंदुओं के वर्ग में कौन आते हैं? क्या किसी धार्मिक वर्ग की अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं को संविधान से सुरक्षा प्राप्त है? इस किस्म के प्रश्नों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट की वृहद पीठ सबरीमाला और इसके साथ सामने आए अन्य धार्मिक मामलों पर अपना निर्णय देगी।
देश के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने अपने फैसले में ऐसे नौ बिंदुओं को रखा, जिनकी वजह से इस मामले को वृहद पीठ को भेजा जा रहा है। अपने निर्णय में चीफ जस्टिस ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने ऐसी बहस को फिर से जीवित करने की कोशिश की है जिसमें, धर्म क्या है, धर्म के महत्वपूर्ण हिस्से कौन से हैं, धर्म के अविभाज्य हिस्से कौन से हैं, आदि प्रश्न शामिल हैं।
कई विविधताओं से भरी भारतीय परिस्थितियों में किसी एक ही देवता को पूजने वाले लोगों के दो वर्गों की पूजा से जुड़ी प्रथाओं में विभिन्नता हो सकती है। इसके बावजूद इन वर्गों को अपनी-अपनी धार्मिक आस्था, अमल और विश्वास के स्वतंत्रता से पालन व प्रचार करने का अधिकार है। इस बात का महत्व नहीं है कि वे अलग धर्म के रूप में पहचाने नहीं जाते हैं।
उनके द्वारा पालन की जा रही धार्मिक प्रधाएं नागरिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के तीसरे भाग में दिए गए प्रावधानों के खिलाफ नहीं जाते, तो इनका पालन करने के लिए वे स्वतंत्र हैं। किसी मंदिर में पूजा करने का व्यक्तिगत अधिकार, उसी मंदिर के धार्मिक समूह के अपने मामलों को खुद चलाने के अधिकार से बढ़ कर नहीं हो सकता।
दूसरे मामले जो सामने आए
चीफ जस्टिस ने कहा कि यह मामला महिलाओं के मंदिर में प्रवेश तक सीमित नहीं रहा है। मुस्लिम महिलाओं के दरगाह व मस्जिद में प्रवेश, गैर पारसी से विवाहित पारसी महिलाओं के अगियारी के पवित्र अग्नि स्थल में प्रवेश, और बोहरा मुस्लिम महिलाओं के जनन अंग भग्न जैसी प्रथा के मामले भी साथ में उठे हैं। अब समय आ गया है कि अदालत अपनी शक्तियों के अनुसार एक न्यायिक नीति बनाए, जिससे पूरा न्याय दिया जा सके। इसके लिए कम से कम सात जजों की वृहद सांविधानिक पीठ का गठन किया जाए।