ये लेडीज हॉस्टल निकला और यहां हमारी तमाम भारतीय छात्राओं से मुलाकात हुई। एक कमरे में दो छात्र रहते हैं, कॉमन एरिया में पैंट्री में खाना बनाने और वॉशिंग मशीन की सुविधा भी है। महीने का किराया 12,000 से लेकर 15,000 रुपए तक का आता है। जबकि मेडिकल की सालाना फीस दो लाख रुपए से लेकर चार लाख तक की हो सकती है। रूस में 50 से ज्यादा मेडिकल कॉलेज हैं और अगर मॉस्को में पढ़ना महंगा है तो कुर्स्क या त्वेर जैसे शहरों में पूरा खर्च कम आता है।
छात्रों की संख्या घटी
एक जमाने में ज्यादा से ज्यादा भारतीय छात्र रूस में मेडिकल या इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने आते थे। बात तब की है जब शीत-युद्ध का दौर था और भारत-रूस सबसे करीबी दोस्तों में थे। लेकिन समय के साथ छात्रों ने अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का रुख करना शुरू कर दिया और रूस इस रेस में थोड़ा पिछड़-सा गया। रूस आकर पढ़ने वाले इंडियन स्टूडेंट्स में से आज भी 90% मेडिसिन की पढ़ाई कर डॉक्टर बनने आते हैं। मैंने भामिनी से पूछा क्या वजह है कि छात्रों की संख्या घटी है।
उन्होंने कहा, "यहां पर सबसे बड़ा चैलेंज भाषा का मिलता है। अगर आपने सीख ली तो बहुत बढ़िया, नहीं तो फिर दिक्कतें शुरू होने लगती हैं।" जबकि विशाल के मुताबिक, "पिछले वर्षों में ऐसे कई मामले हुए हैं जिनमें रूस आकर मेडिसिन पढ़ने वाले छात्रों को पहले से नहीं बताया गया था कि पूरी पढाई रूसी भाषा में ही करनी है"। आज भी दुनिया के सवा सौ से ज्यादा देशों के छात्र रूस में मेडिकल और दूसरे विषयों की पढ़ाई करने आते हैं। वजह है पढ़ाई का थोड़ा सस्ता होना या फिर दूसरे देशों के मुकाबले थोड़ा आसानी से एडमिशन मिलना।
बावजूद इसके पिछले कुछ सालों में कई भारतीय छात्रों के तजुर्बे बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। 2017 में 'स्मोलेंस्क स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी' के 100 से भी ज्यादा भारतीय छात्रों को एक साल पढ़ाई कर भारत वापस लौटना पड़ा था क्योंकि उनके मुताबिक "उन्हें नहीं बताया गया था कि पूरे छह साल रूसी भाषा में ही पढ़ना पड़ेगा।"
मामला रूस में भारतीय दूतावास तक भी पहुंचा था। रूस में भारतीय राजदूत पंकज सरन ने बीबीसी हिंदी से छात्रों की समस्या के बारे में विस्तार से बात की। उन्होंने बताया, "सोवियत संघ के जमाने में यहां बहुत स्टूडेंट्स पढ़ते थे, बीच में गिरावट आई। अब कुछ बढ़ोतरी हो रही है। असल में दोनों देशों में थोड़ा इन्फॉर्मेशन गैप है जिसको हमें कम करना है। दूसरा प्रॉब्लम भाषा का आता है क्योंकि सारा पढ़ाने का काम रूसी में है। तीसरा ये कि अभी भी हमारी दोनों सरकारों के बीच में डिग्री रेकग्निशन अभी नहीं हुआ है, इससे भी हमारे जो बच्चे हैं वो थोड़ा संकोच करते हैं आने में"।
हकीकत यही है कि पिछले कुछ सालों में इस तादाद में जबरदस्त गिरावट आई है। भाषा की मजबूरी के अलावा एक बड़ी वजह भारत में मौजूद एजुकेशन एजेंट्स पर कम होता भरोसा है। कुछ दिनों बाद मॉस्को के रेड स्क्वेयर पर मेरी मुलाकात करीब आधा दर्जन मेडिकल छात्रों से हुई। विशाल शर्मा भी वहां पहुंचे थे।
रूस ही क्यों जाते रहे हैं छात्र
उन्होंने कहा, "भारत से आने वाले मेडिकल स्टूडेंट्स कंसल्टेंट्स के थ्रू आते हैं। लगभग सभी कहीं न कहीं धोखे में रहते हैं। इन्हें पूरी इन्फॉर्मेशन और गाइडलाइन्स के साथ नहीं भेजा जाता है। जो चीज उन्हें बोली जाती है वो चीज असल में होती नहीं है। वो यहां पर आकर अपना बैगेज लेकर खड़े हुए होते हैं, पता भी नहीं होता है कि आगे का ऐडमिशन प्रोसेस क्या है"। पिछले कई वर्षों में बढ़ती शिकायतों के बाद दोनों देशों की सरकारें इस मुहिम में लगी रही हैं कि रूस जाकर पढ़ने के इच्छुक 'सत्यापित एजेंटस' के जरिए ही जाएं।
उस दिन जिन दूसरे छात्रों से हमारी बात हुई वे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और गोवा तक से यहां पढ़ने आए थे। इंदौर की रहने वाली अनामिका को लगता है, "ये धारणा गलत है कि यहां आने वाले छात्रों को बाद में तकलीफों का सामना करना पड़ता है।" उन्होंने कहा, "ये भी ध्यान रखने की जरूरत है कि रूस के मेडिकल कॉलेजों की क्वालिटी दुनिया भर में मशहूर है।" और जब भारत लौटते हैं। लेकिन छात्रों के अलावा उनके परिवारों की एक बड़ी चिंता ये भी रही है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत लौटने पर क्या होगा। दरअसल, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) का नियम है कि रूस से डॉक्टरी की पढ़ाई कर भारत में प्रैक्टिस करने के लिए एक परीक्षा पास करनी पड़ेगी।
दर्जनों मामले देखे गए हैं जब छात्र इस परीक्षा को पास नहीं कर सके और परेशानी में पड़ गए क्योंकि पढ़ाई के बाद रूस में काम करना मुमकिन नहीं रहता। जब मैंने अनामिका से यही सवाल पूछा तो उनके मुस्कुराते चेहरे में थोड़ी-सी शिकन जरूर दिखी थी। उन्होंने कहा, "उम्मीद तो यही है कि उस परीक्षा को पास कर लेंगे। नहीं हुआ तब देखेंगे क्या करना है।"