विधेयक पारित करने का अच्छा समय
लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण के लिए संविधान संशोधन करने का यह सबसे अच्छा समय है। महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन 108 वां विधेयक राज्यसभा में पहले से पारित है। यह विधेयक 2010 में राज्यसभा में पारित हुआ, पर तब यह लोकसभा में पारित नहीं हो पाया था और 2014 में लोकसभा भंग होने के साथ ही यह रद्द हो गया था।
चूंकि राज्यसभा स्थायी सदन है, इसलिए यह बिल अभी जिंदा है। अब लोकसभा इसे पारित कर दे, तो राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा। 2019 के लोकसभा चुनाव नए कानून के तहत हो सकते हैं और नई लोकसभा में 33 फीसदी महिलाएं आ सकती हैं। लेकिन ऐसा करने के लिए अब सिर्फ एक साल का समय बचा है।
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तब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने यह कहा था कि केंद्र में कांग्रेस की सरकार आएगी, तो वह महिला आरक्षण बिल लाएगी, गेंद भाजपा के पाले में डाल दी थी। महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन विधेयक लाने वाली पार्टी होने के नाते इस मायने में कांग्रेस की प्रतिबद्धता जाहिर है।
अपनी सरकार रहते हुए कांग्रेस इसे राज्यसभा में पारित भी करा चुकी है। इसके अलावा कांग्रेस की सरकार 1993 में ही पंचायतों में महिला आरक्षण लागू कर चुकी है, जो पंचायतों में सफलतापूर्वक चल रही है। अब राजग और भाजपा को साबित करना है कि महिला आरक्षण के सवाल पर वे गंभीर और ईमानदार हैं। कांग्रेस पार्टी पहले से ही महिला आरक्षण बिल के समर्थन में रही है और अब राहुल गांधी की चिट्ठी ने इसपर मुहर लगा दी है।
पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी हमेशा से महिलाओं की पक्षधर रही हैं। उनका कहना है कि भारत में महिलाओं को और ताकतवर बनाने की जरूरत है। उन्होंने पिछले सत्र में मोदी सरकार से मांग की थी कि महिला आरक्षण बिल को पास किया जाए।
संसद में महिलाओं का औसत देखें तो विश्व का औसत जहां 22.6 फीसदी है। इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन की रिपोर्ट के मुताबिक, संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में दुनिया के 193 देशों में भारत का स्थान 148वां है।
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संसद में महिलाओं के आंकड़ें देखें तो रवांडा 63 फीसदी के स्तर पर हैं और नेपाल में 29.5 फीसदी महिलाएं संसद में हैं। अफगानिस्तान में 27.7 फीसदी और चीन की संसद में 23.6 फीसदी महिला सांसद हैं। पाकिस्तान में भी संसद में 20.6 फीसदी महिला सांसद हैं। वहीं भारत का औसत केवल 12 फीसदी है।
बहरहाल इन तमाम अड़चनों के चलते महिला आरक्षण विधेयक एक सत्र से दूसरे सत्र और एक लोकसभा से दूसरी लोकसभा तक टलता जा रहा है।
राजनीति में महिला भागीदारी कम होने का कारण है कि महिला आरक्षण बिल 22 साल से अटका हुआ है। 1996 में पहली बार पेश होने के बाद और 2010 में राज्यसभा से पास होने के बाद भी यह दुबारा लोकसभा से पास नहीं हो पाया। इसकी बड़ी वजह सपा, बसपा और आरजेडी का कड़ा विरोध और कोटे के भीतर कोटे की मांग था जिसके चलते ये बिल अधड़ में लटका हुआ है।
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मजेदार बात यह है कि हर चुनाव में महिला आरक्षण बिल एक बड़ा मुद्दा बनता है। हर लोकसभा में इसे लाने की और फिर इसे पास करवाने की बात की जाती है। जानकारों का यह भी मानना है कि लोकसभा में सत्ताधारी गठबंधन को पूर्ण बहुमत हासिल है, यानी नरेंद्र मोदी सरकार पूर्ण बहुमत की सरकार है और उसके सामने वह दिक्कत नहीं है, जो मनमोहन सरकार को थी।
मनमोहन सरकार में कांग्रेस का अपना बहुमत नहीं था और कई समर्थक दल महिला आरक्षण विधेयक को मौजूदा रूप में पारित करने के लिए तैयार नहीं थे। लेकिन मौजूदा लोकसभा में न सिर्फ सत्ताधारी गठबंधन का बहुमत है, बल्कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भी महिला आरक्षण के समर्थन में है। इसके अलावा वामपंथी दल भी महिला आरक्षण लागू करना चाहते हैं। ऐसे में यह सरकार पर है कि वह महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन बिल लाए। इसके बिना भारत में संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का समुचित प्रतिनिधित्व संभव नहीं दिखता।