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क्या वाकई बादलों के पार नहीं देख पाता 'रडार', जानिए इसकी तकनीकी के बारे में सबकुछ

न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: Shilpa Thakur Updated Wed, 15 May 2019 03:15 PM IST
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तटीय निगरानी रडार - फोटो : सोशल मीडिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक समाचार चैनल को दिया गया साक्षात्कार इनदिनों काफी चर्चा में है। इसमें उन्होंने रडार को लेकर एक बात कही थी, जिसके बाद मीडिया और राजनीतिक हलके में तकनीक को लेकर एक नई बहस ने जन्म ले लिया। प्रधानमंत्री ने बालाकोट एयरस्ट्राइक को लेकर कहा था, "विशेषज्ञ (हमले की) तारीख बदलना चाहते थे, लेकिन मैंने कहा कि इतने बादल हैं, बारिश हो रही है तो एक फायदा है कि हम रडार (पाकिस्तानी) से बच सकते हैं, सब उलझन में थे क्या करें। फिर मैंने कहा बादल है, जाइए... और (सेना) चल पड़ी..." तो चलिए जानते हैं कि आखिर रडार क्या है और ये कैसे काम करता है।

क्या है रडार?

रडार का मतलब रेडियो डिटेंशन और रेंजिंग होता है। रडार में आमतौर पर एक मैग्नेट्रोन, ट्रांसमीटर, रिसीवर और एक स्क्रीन होती है। मैग्नेट्रॉन रेडियो तरंगों को उत्पन्न करता है, जो एक निश्चित समय अंतराल पर विभिन्न दिशाओं में एक एंटीना के माध्यम से जारी होते हैं। यदि हवा में कोई वस्तु है, उदाहरण के लिए, एक हवाई जहाज, तो रेडियो तरंगें टकराती हैं और रिफ्लेक्ट होती हैं, जिससे रडार के रिसीवर को उस वस्तु की जानकारी मिल जाती है। 

ग्रिड मैप के साथ स्क्रीन पर रिफ्लेक्ट हुई तरंगों से मैपिंग होती है। इसके बाद स्क्रीन पर विमान एक ब्लिप एक रूप में दिखता है, साथ ही उसकी चाल का भी पता चलता है। अकसर ऐसा हॉलीवुड फिल्मों मे भी देखा जाता है। ये रडार का एक बेसिक प्रिंसिपल माना जाता है। अब वक्त के साथ रडार में तकनीकी प्रगति हुई है। जिससे अब ये और भी अधिक विकसित हो गए हैं।



इसमें रेडियो तरंगे होने के कारण ये आसमान में बादल छाए होने पर, दिन में और रात में भी देख सकते हैं। इसका मतलब ये है कि रडार हर स्थिति में काम करता है। किसी शहर का मौसम खराब हो तो भी कमर्शियल फ्लाइट लगातार टेक ऑफ और लैंड करती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि दुनियाभर का एयर ट्रैफिक कंट्रोलर (एटीएस) रडार पर ही निर्भर होता है।

सभी एटीएस के पास दो रडार होते हैं। एक होता है प्राइमरी और दूसरा होता है सेकेंड्री। प्राइमरी एक क्लासिक रडार है, जो एक प्रिंसिपल पर आधारित है। जबकि सेकेंड्री रडार विमान की सभी जानकारी का पता लगाता है। इसका मतलब ये हुआ कि रडार आसमान में बादल होने के बावजूद भी अपना काम जारी रखते हैं। यही बात पाकिस्तानी रडारों पर भी लागू होती है।

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तटीय निगरानी रडार - फोटो : सोशल मीडिया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक समाचार चैनल को दिया गया साक्षात्कार इनदिनों काफी चर्चा में है। इसमें उन्होंने रडार को लेकर एक बात कही थी, जिसके बाद मीडिया और राजनीतिक हलके में तकनीक को लेकर एक नई बहस ने जन्म ले लिया। प्रधानमंत्री ने बालाकोट एयरस्ट्राइक को लेकर कहा था, "विशेषज्ञ (हमले की) तारीख बदलना चाहते थे, लेकिन मैंने कहा कि इतने बादल हैं, बारिश हो रही है तो एक फायदा है कि हम रडार (पाकिस्तानी) से बच सकते हैं, सब उलझन में थे क्या करें। फिर मैंने कहा बादल है, जाइए... और (सेना) चल पड़ी..." तो चलिए जानते हैं कि आखिर रडार क्या है और ये कैसे काम करता है।

क्या है रडार?

रडार का मतलब रेडियो डिटेंशन और रेंजिंग होता है। रडार में आमतौर पर एक मैग्नेट्रोन, ट्रांसमीटर, रिसीवर और एक स्क्रीन होती है। मैग्नेट्रॉन रेडियो तरंगों को उत्पन्न करता है, जो एक निश्चित समय अंतराल पर विभिन्न दिशाओं में एक एंटीना के माध्यम से जारी होते हैं। यदि हवा में कोई वस्तु है, उदाहरण के लिए, एक हवाई जहाज, तो रेडियो तरंगें टकराती हैं और रिफ्लेक्ट होती हैं, जिससे रडार के रिसीवर को उस वस्तु की जानकारी मिल जाती है। 

ग्रिड मैप के साथ स्क्रीन पर रिफ्लेक्ट हुई तरंगों से मैपिंग होती है। इसके बाद स्क्रीन पर विमान एक ब्लिप एक रूप में दिखता है, साथ ही उसकी चाल का भी पता चलता है। अकसर ऐसा हॉलीवुड फिल्मों मे भी देखा जाता है। ये रडार का एक बेसिक प्रिंसिपल माना जाता है। अब वक्त के साथ रडार में तकनीकी प्रगति हुई है। जिससे अब ये और भी अधिक विकसित हो गए हैं।

इसमें रेडियो तरंगे होने के कारण ये आसमान में बादल छाए होने पर, दिन में और रात में भी देख सकते हैं। इसका मतलब ये है कि रडार हर स्थिति में काम करता है। किसी शहर का मौसम खराब हो तो भी कमर्शियल फ्लाइट लगातार टेक ऑफ और लैंड करती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि दुनियाभर का एयर ट्रैफिक कंट्रोलर (एटीएस) रडार पर ही निर्भर होता है।

सभी एटीएस के पास दो रडार होते हैं। एक होता है प्राइमरी और दूसरा होता है सेकेंड्री। प्राइमरी एक क्लासिक रडार है, जो एक प्रिंसिपल पर आधारित है। जबकि सेकेंड्री रडार विमान की सभी जानकारी का पता लगाता है। इसका मतलब ये हुआ कि रडार आसमान में बादल होने के बावजूद भी अपना काम जारी रखते हैं। यही बात पाकिस्तानी रडारों पर भी लागू होती है।

तटीय निगरानी रडार

उपयोग की शुरुआत?

रडार आविष्कार दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1935 में हुआ था। इसका इस्तेमाल सबसे पहले ब्रिटेन ने किया था। युद्ध के दौरान ब्रिटेन के पास रडार की एक पूरी चेन थी। जिसकी सहायता से वह घुसपैठियों का पता भी लगाता था। इस युद्ध के खत्म होने के समय लगभग सभी प्रमुख देशों के पास अपने रडार थे।

ग्राउंड रडार अधिक बेहतरी के साथ काम नहीं कर पाते हैं। यही कारण है कि विमानों पर रडार लगाए गए थे, जो 360 डिग्री कवरेज के साथ जमीन से हजारों फीट ऊपर उड़ते हैं। इन्हें एयरबोर्न वॉर्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (एडब्लूएसीएस) कहा जाता है। आज के समय में युद्ध के दौरान भी इसका काफी इस्तेमाल होता है।

26 फरवरी को बालाकोट एयरस्ट्राइक के दौरान भारतीय वायु सेना ने अपने मिशन पर लड़ाकू जेट विमानों को निर्देशित करने और पाकिस्तानी विमानों द्वारा किसी भी कार्रवाई से बचाने के लिए स्वदेशी और इजरायली एडब्लूएसीएस का इस्तेमाल किया था।

विमान कैसे बचते हैं रडार से?

वक्त के साथ-साथ रडार का तो विकास हुआ ही है, लेकिन इसके साथ ही रडार से बचने की तकनीक भी विकसित हुई है। इस तकनीक को स्टेल्थ तकनीक कहते हैं। हालांकि ये तकनीक अपनेआप में संपूर्ण नहीं है। 

इसमें रडार से बचने के लिए कुछ तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे कम ऊंचाई पर विमान उड़ाना। इसके अलावा एक अन्य तरीका है कि विमान को कुछ इस तरह से डिजाइन किया जाए, जिससे रेडियो की तरंगे रिफ्लेक्ट होने की बजाय सीधे निकल जाएं। 


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