1984 में सिख विरोधी दंगों से जुड़े एक मामले में अदालत ने 34 साल बाद दोषी यशपाल को मौत की सजा और दूसरे दोषी नरेश को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। बुधवार को दोनों आरोपियों को हत्या, हत्या की कोशिश, लूटपाट, आगजनी व अन्य धाराओं में दोषी करार दिया था। दशकों की लड़ाई के बाद सिख समुदाय में आज खुशी तो है लेकिन क्या इससे सिख समुदाय संतुष्ट है। जानिए 34 साल पहले क्यों और कैसे शुरू हुई थी ये कहानी...
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद फैले सिख विरोधी दंगों में लगभग पांच हजार निर्दोष सिखों की हत्या की बात कही जाती है। इस घटना के लगभग 34 साल बीत जाने के बाद सिखों को न्याय मिला है। हालांकि सिख समुदाय कांग्रेस के नेता जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
कानपुर में भी दंगों के दौरान 127 सिखों की हत्या कर दी गई थी। सिखों का कहना है कि एक नवंबर को कानपुर में सिखों का कत्लेआम किया गया था। लेकिन इस मामले में बहुत दिनों तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई। बाद में जब एफआईआर दर्ज की गई तो स्टेटस रिपोर्ट में कोई पुख्ता सबूत न होने की बात कहकर केस खत्म कर दिया गया। सिखों का कहना है कि यह शर्मनाक है कि 127 लोगों की हत्या हो गई और पुलिस को कोई सबूत नहीं मिलता।
इंदिरा गांधी की हत्या करने वाले उनके अंगरक्षक ही थे
1984 में फीरोजाबाद में हुए दंगे का फैसला सोमवार को आया।
बता दें कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देशभर में सिख दंगे भड़क गए थे। दरअसल इंदिरा गांधी की हत्या करने वाले उनके अंगरक्षक ही थे। और दोनों ही अंगरक्षक सिख थे, जिसके बाद देश में लोग सिखों के खिलाफ भड़क गए थे। इस घटना के बाद देश में खून की होली खेली गई थी। माना जाता है कि इन दंगों में पांच हजार लोगों की मौत हो गई थी। अकेले दिल्ली में करीब दो हजार से ज्यादा लोग मारे गये थे।
दंगों के बाद सीबीआई ने कहा था कि यह दंगे कांग्रेस सरकार और दिल्ली पुलिस ने मिल कर कराए हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि जब कोई पेड़ गिरता है तो पृथ्वी हिलती है। उनका यह बयान काफी सुर्खियों में रहा था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर सिखों के गुस्से की वजह यह थी कि 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान उन्होंने भारतीय सेना को स्वर्ण मंदिर पर कब्जा करने का आदेश दिया था। इस दौरान मंदिर में घुसे सभी विद्रोहियों को मार दिया गया था। जो कि ज्यादातर सिख ही थे। इन सभी हथियारों से लैस विद्रोहियों ने स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया था।
इनकी मांग थी कि ये खालिस्तान नाम का अगल देश चाहते थे। जहां केवल सिख और सरदार कौम ही रह सके। इसका सरकार ने कड़ा विरोध किया और इन अलगाववादियों पर कार्रवाई की। इस दौरान हुए आप्रेशन को आप्रेशन ब्लू स्टार कहा जाता है। इन खालिस्तानियों का नेतृत्व सिख धर्म गुरु सरदार जरनैल सिंह भिंडरावाले ने किया था।
जरनैल सिंह भिंडरावाले की मौत के बाद इंदिरा गांधी से नाराज हो गए थे सिख
Sikh riots 1984
जब इंदिरा सरकार ने सैनिकों को मंदिर के अंदर घुसने का आदेश दिया था। तो मंदिर के अंदर जरनैल सिंह भिंडरावाले और उसके सहयोगियो ने सैनिकों पर हमला कर दिया था। खालिस्तानियों की बढ़ती तादात को देखते हुए इंदिरा सरकार ने तोपों के साथ चढ़ाई करने का आदेश दिया था। जिसमें जरनैल सिंह भिंडरावाले और उसके सहयोगियों की मौत हो गई थी।
भिंडरावाले की मौत के बाद इंदिरा सरकार के खिलाफ सिखों का गुस्सा फूट गया। इसका बदला लेने के लिए इंदिरा गांधी के अंगरक्षकों ने जो कि सिख ही थे, उन्होंने इंदिरा को मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद देशभर में सिखों के खिलाफ दंगे भड़क गए। इस दौरान लाखों सिखों ने अपना घर छोड़ दिया। जबकि हजारों सिखों ने अपनी जान गंवा दी। सिख दिल्ली, पंजाब और हरियाणा से निकलकर उत्तर प्रदेश, बिहार समेत अन्य राज्यों में बस गए। तभी से सिख समुदाय सरकार और कोर्ट से न्याय की मांग कर रहा था।
सिख चाहते हैं कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर को मिले सजा
दोषियों को सजा मिलने के बाद खुशी मनाते पीड़ित
- फोटो : विजय सिंघल
ये मामला 1 नवंबर 1984 का है। टाइटलर पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वर्ष 1984 में पुल बंगश में हुए सिख दंगा मामले में तीन लोगों बादल सिंह, ठाकुर सिंह, और गुरचरण सिंह की हत्या का आरोप है।
कब क्या हुआ
सबसे पहले 2005 में नानावटी कमीशन ने अपने जांच में जगदीश टाइटलर का नाम लिया। उसके बाद सीबीआई ने टाइटलर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी, जिसके चलते टाइटलर को केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। टाइटलर पर आरोप है कि सिखों की हत्या के वक्त वो वहां मौजूद थे। इससे पहले 29 सितंबर 2007 को कोर्ट में पहली क्लोजर रिपोर्ट दी थी। रिपोर्ट में सीबीआई ने कहा था कि इस मामले का मुख्य गवाह जसबीर सिंह लापता है और वो नहीं मिल रहा है।
कैलिफोर्निया में मिले जसबीर सिंह का कहना था कि सीबीआई ने कभी उससे पूछताछ ही नहीं की। इसके बाद कोर्ट ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करते हुए मामले की फिर से जांच करने का निर्देश दिया था। कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने कुल 6 गवाहों के बयान दर्ज किए इसमें जसबीर सिंह भी शामिल था। सीबीआई ने कैलिफोर्निया जाकर जसबीर सिंह का बयान दर्ज किया था, लेकिन फिर भी सीबीआई ने उसे भरोसेमंद गवाह नहीं माना।
सीबीआई ने अप्रैल 2009 में एक बार फिर से मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की। सीबीआई रिपोर्ट के मुताबिक 1 नवंबर 1984 को पुलबंगश में हुए दंगे के दौरान टाइटलर मौके पर मौजूद नहीं थे। सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट मे कहा था कि टाइलटर उस वक्त दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निवास तीन मूर्ति भवन में थे।