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कारगिल की लड़ाई में एयरफोर्स का सीमित इस्तेमाल...और वह भी देरी से, जानिए क्यों और कैसे...

Wed, 25 Jul 2018 04:28 PM IST
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली 
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कारगिल की लड़ाई हम जीत गए। भारतीय सीमा में घुसी पाक सेना को हमने मार भगाया। इस बीच एक सवाल ऐसा भी उपजा, जो भारतीयों के जेहन में लंबे समय तक घूमता रहा। 

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कारगिल की लड़ाई में भारतीय वायु सेना की भूमिका कैसी रही, क्या वायुसेना का सीमित इस्तेमाल हुआ, अगर हुआ तो क्या उसकी मंजूरी भी देरी से मिली। 
मंजूरी देने की प्रक्रिया में राजनीतिक नेतृत्व, तीनों सेनाएं और रक्षा मंत्रालय, इनके बीच कोई टकराव हुआ तो कहां और क्यों... हालांकि विजयी होने के बाद थल सेना अध्यक्ष और वायुसेना अध्यक्ष के बीच जो पत्राचार हुआ, उसका सीधा मतलब यही था....

‘हम ही हम हैं तो क्या हम हैं
तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो’

...जब परवेज मशर्रफ ने चोरी-छिपे आपरेशन ‘बदर’ शुरू कर दिया

कारगिल की लड़ाई के दौरान भारतीय सेना अध्यक्ष रहे वेद प्रकाश मलिक ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि पाकिस्तानी फौज के जनरल परवेज मशर्रफ के नापाक इरादों में बारे में कोई नहीं जानता था। खुद पाकिस्तानी हुक्मरान भी कई बातों से अनभिज्ञ थे। 
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परवेज ने जब भारतीय सीमा में घुसपैठ के लिए आपरेशन बदर शुरू किया था तो पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके मंत्रिमंडल के कई सहयोगी इसके बारे में बहुत कम जानते थे। यहां तक कि पाकिस्तानी नौसेना और एयरफोर्स को भी इसकी ज्यादा भनक नहीं थी। बतौर मलिक, परवेज एक हेलीकॉप्टर में सवार होकर आपरेशन बदर की अग्रिम पंक्ति जो एलओसी पार कर चुकी थी, से मिलने के लिए चला आया। यह उनका निजी दुस्साहस था। 

पाकिस्तान की छद्म रणनीति के बारे में किसी को कोई नहीं जानकारी नहीं थी। भारत कारगिल की स्थिति को क्या मानकर कार्रवाई करे, इस सवाल ने सभी को बांध कर रख दिया। लड़ाई शुरू होने के बाद यह एक अहम वजह रही कि हम वायुसेना की मारक क्षमता का इस्तेमाल करने जैसा बड़ा निर्णय समय पर नहीं ले सके।

...तो इसलिए भारतीय वायुसेना ने धैर्य बनाए रखा 

18 मई 1999, कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) की बैठक चल रही थी। तत्कालीन वाइस चीफ ऑफ एयरस्टाफ चंद्रशेखर ने कारगिल में वायुसेना की मदद की बात कही। 

उन्होंने कहा, इस अपमानजनक स्थिति में वायुसेना की मारक क्षमता का इस्तेमाल जरूरी है। सीसीएस ने उनके प्रपोजल को नकार दिया। तर्क यह दिया गया कि इससे स्थिति बिगड़ सकती है। ऐसे में भारत-पाक के बीच ट्रैक-2 डायलाग की संभावना खत्म हो जाएगी। 

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सेनाध्यक्ष मलिक के मुताबिक, चंद्रशेखर ने मुझे विश्वास दिलाया कि कारगिल में वायुसेना की उपस्थिति जरूरी है। वायुसेना और नेवी के मामले में हम पाक पर भारी हैं। बैठकें और तर्क-वितर्क चलते रहे, मगर हमें अपने फाइटर जहाजों को उड़ाने की मंजूरी नहीं मिली।

...अगर शुरू में वायुसेना उतरती तो भारत-पाक के बीच युद्ध तय था 

सीसीएस अपनी बात पर अड़ी थी कि वायुसेना कारगिल नहीं जाएगी। हमें पाक के इरादों का पता नही है। हमारी छोटी सी गलती युद्ध को बुलावा दे सकती है। ऐसी हालत में भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था को कैसे और क्या जवाब देगी।

...तीनों सैन्य अंगों की भी एक राय नहीं थी 

23 मई को फिर बैठक हुई। इसमें नौसेना प्रमुख सुशील कुमार भी शामिल हुए। उन्होंने वायुसेना के इस्तेमाल का समर्थन किया। हालांकि वायुसेना अध्यक्ष अनिल यशवंत टिपनिस उस वक्त तक खुद भी इस पहल को कोई खास तव्वजो नहीं दे रहे थे। 

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उनका तर्क था कि ज्यादा ऊंचाई पर हेलीकॉप्टर ले जाना जोखिम भरा है। टिपनिस ने जनरल मलिक को पत्र लिखकर हवाई मारक क्षमता और राजनीतिक एवं सामरिक बाध्यता के बारे में बताया। 

अंत में लिखा, एक बार फिर सोचें। मलिक ने जवाब दिया कि कारगिल व लद्दाख में लड़ रही सेना को वायुसेना का सहयोग जरूरी है। मैं इसके लिए सीसीएस के सामने आपका यानी टिपनिस का विरोध करूंगा।
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...इस बार विदेश मंत्री जसवंत सिंह विरोध में उतर गए 

फिर सीसीएस की बैठक हुई। इस बार एनएसए ब्रजेश मिश्र, रॉ-आईबी, आर्मी इंटेलीजेंस और रक्षा मंत्रालय के अफसर भी बैठक में उपस्थित थे। वायुसेना को कारगिल भेजने पर सबकी सहमति बन ही रही थी कि विदेश मंत्री जसवंत सिंह अड़ गए। 

उन्होंने कहा, वायुसेना अगर कारगिल में उतरती है तो स्थिति बिगड़ जाएगी। अंतिम निर्णय यह हुआ कि पहले एलओसी से घुसपैठ हटाओ। ध्यान रहे कि आईबी या एलओसी के पार नहीं जाना है। इस बीच परवेज मुशर्रफ को भारतीय तैयारी का अंदाजा हो चुका था। 

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उन्होंने धमकी दी कि अगर भारत ने कोई बड़ा कदम यानी एयर मारक क्षमता का इस्तेमाल या मिसाइल जैसा कुछ दागा तो पाकिस्तान उसका जवाब देगा। यह धमकी हमारे लिए रामबाण साबित हुई। मलिक के अनुसार, इसे सामने रखकर और मौजूदा स्थिति का हवाला देकर हमने राजनीतिक नेतृत्व को वायुसेना के सीमित इस्तेमाल के लिए राजी कर लिया। शुरुआत में नुकसान उठाया, मगर बाद में वायुसेना ने अचूक बमबारी कर पाक सेना को भागने के लिए मजबूर कर दिया

24 मई को राजनीतिक नेतृत्व की स्वीकृति मिलते ही वायुसेना कारगिल पहुंच गई। एमआई-35 हेलिकॉप्टर मौसम खराब होने के कारण उड़ नहीं सका। दो दिन बाद एमआई-17 गिर गया। इसके बाद दो मिग मार गिराए गए। चिंता होने लगी कि वायुसेना को कारगिल भेजना कहीं गलत निर्णय तो नहीं था।

कमी तलाशी गई तो पता चला कि लड़ाकू जहाज अपने टारगेट को ठीक तरह से निशाना नहीं बना पा रहे हैं। इस कमी को दूर कर वायुसेना ने लगातार एक हजार से ज्यादा स्ट्राइक की। लड़ाकू जहाजों ने 250-1000 किलोग्राम तक के बमों की वर्षा कर दी। नतीजा, पाकिस्तानी सेना को भागना पड़ा।

करगिल की लड़ाई में किसे क्या नाम मिला.....

थलसेना ने नाम दिया, आपरेशन विजय 
वायुसेना की भूमिका को आपरेशन सफेद सागर 
नौसेना के रोल को आपरेशन तलवार कहा गया 

दोनों तरफ फर्क इतना रहा कि हमें राजनीतिक नेतृत्व और अंतरराष्ट्रीय जनमत को भी ध्यान में रखना था। पड़ोसी मुल्क में सेना के दुस्साहस को रोकने वाला कोई नहीं था। वहां की चुनी हुई सरकार के हाथ से सेना करीब करीब निकल चुकी थी। 

कारगिल की घटना के कई साल बाद खुद नवाज शरीफ ने यह स्वीकार किया था कि उन्होंने परवेज मुशर्रफ को सेना सौंपकर बड़ी गलती की थी। वायुसेना का हमें भरपूर सहयोग मिला। नौ सेना भी हर सम्भावित हालात का सामना करने के लिए तैयार थी। - जनरल वीपी मलिक, तत्कालीन थलसेनाध्यक्ष
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