पांच राज्यों के चुनावों के बाद भाजपा की जीत के अलावा जिस चीज ने सबसे ज्यादा चर्चा बटोरी है वो हैं ईवीएम। देशभर में भाजपा की जीत के अलावा सबसे ज्यादा चर्चा ईवीएम की ही हो रही है। बसपा नेता मायावती ने तो उत्तर प्रदेश में अपनी करारी हार के लिए ईवीएम को ही जिम्मेदार ठहराया है तो अब पंजाब में अपनी हार का ठीकरा आप संयोजक अरविंद केजरीवाल भी ईवीएम के ही सिर फोड़ रहे हैं।
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दोनों नेताओं ने आरोप लगाया कि ईवीएम से छेड़छाड़ कर विपक्षियों के वोट को चुनाव जीतने वाली पार्टियों के पक्ष में कर दिया गया। हालांकि चुनाव आयोग ने ईवीएम से किसी तरह की छेड़छाड़ और हैकिंग की बात को नकारते हुए दोनों नेताओं के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।
बावजूद उसके ईवीएम पर मचा हल्ला अभी शांत होने का नाम नहीं ले रह है। मायावती तो इसके विरोध में देशभर में 11 अप्रैल से काला दिवस मनाने की घोषणा भी कर चुके हैं तो केजरीवाल आगामी एमसीडी चुनाव अभी भी ईवीएम से कराने की मांग पर अड़े हैं।
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बहरहाल ईवीएम पर उठे सवालों के बीच कुछ जिज्ञासा उस आम वोटर की भी है जिसने इसके द्वारा चुनाव डालकर अपने मतदान का प्रयोग किया। ऐसे में आपकी शंकाओं के निदान के लिए हम ढूंढकर लाए हैं ईवीएम से जुड़े हर छोटे बड़े सवाल का जवाब, आप भी जानिए क्या ईवीएम से संभव है हैकिंग?
क्या है ईवीएम
-ईवीएम का मतलब है इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन
-ईवीएम में एक बार में अधिकतम 3840 मत डाले जा सकते हैं
-एक ईवीएम मशीन में अधिकतम 16 प्रत्याशियों के लिए मतदान हो सकता है, इससे ज्यादा प्रत्याशी बढ़ने पर एक मशीन से दूसरी को जोड़ दिया जाता है, एक बार में अधिकतम चार मशीन जोड़कर 64 प्रत्याशियों के लिए वोट डलवाया जा सकता है
-ईवीएम से एक बार में एक ही व्यक्ति वोट डाल सकता है, जब तक उसे मतदानकर्मी द्वारा दूसरा वोट डालने के लिए तैयार न कर दिया जाए
-ईवीएम की मेमोरी में परिणाम चुनाव के परिणाम दस वर्षों तक सुरक्षित रह सकते हैं
-ईवीएम दो तरह की होती है बैलेट और कंट्रोल यूनिट तीसरी तरह की यूनिट को VVPAT कहा जाता है। जिसका उपयोग चुनाव आयोग ने इस बार कुछ सीटों पर किया है।
-भारत में इस्तेमाल की जाने वाली ईवीएम भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बेंगलूर एवं इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया, हैदराबाद के सहयोग से तैयार की जाती हैं।
क्या है इसका इतिहास
EVM
-यूं तो भारत में ईवीएम का इतिहास लगभग 35 साल पुराना है जब 1982 में केरल के विधानसभा चुनावों में कुछ सीटों पर इसका प्रयोग हुआ।
-हालांकि उन चुनावों को लेकर काफी विवाद हुआ और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ईवीएम से हुई वोटिंग को रद कर दिया गया।
-विधिवत रूप से ईवीएम का प्रयोग सबसे पहले 1998 के विधानसभा चुनावों में हुआ जहां 16 सीटों पर इसका इस्तेमाल करके इसे जांचा परखा गया
-इनमें से मध्य प्रदेश और राजस्थान की 5-5 जबकि दिल्ली की 6 सीटों पर ईवीएम से मतदान हुआ
-इसके बाद अगले साल यानि 1999 के लोकसभा चुनावों में भी कुछ सीटों पर इसका इस्तेमाल हुआ
-2004 के बाद सभी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ईवीएम से वोटिंग शुरू की गई
कितनी सुरक्षित है ईवीएम
-ईवीएम में इस्तेमाल की गई चिप 'वन टाइम यूज' वाली होती है जिसे एक बार इस्तेमाल करके दोबार काम में नहीं लाया जा सकता, ऐसे में पहले से फीड प्रोगाम में बदलाव की गुंजाइश नहीं होती
-ईवीएम किसी तरह इंटरनेट से कनेक्ट नहीं होती इसलिए इसे इंटरनेट के द्वारा हैक नहीं किया जा सकता
-ईवीएम को बूथ पर भेजते समय यह नहीं बताया जाता की कौन सी मशीन कहां जाएगी इसलिए उसमें कुछ भी पहले से फीड करना संभव नहीं है
-ईवीएम से वोटिंग से पहले उसे सभी प्रत्याशियों के सामने चेक करके और उनकी संतुष्टि होने पर ही वोटिंग के लिए तैयार किया जाता है
-सुप्रीम कोर्ट में कई बार ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर चुनौती दी गई है लेकिन आज तक कोई दावा सही नहीं पाया गया है
-वोटिंग के दिन मतदान केंद्र पर एक रजिस्टर बनाया जाता है जिसमें मतदाताओं की डिटेल अंकित रहती है। इन मतदाताओं की संख्या का मिलान ईवीएम में डाले गए वोटों से भी होता है।
-ईवीएम से बूथ कैप्चरिंग जैसी घटनाएं रुकी हैं क्योंकि एक मिनट में 5 और आधे घंटे में 150 से ज्यादा वोट ईवीएम से नहीं डाले जा सकते, जबकि बैलेट पेपर से आधे घंटे में 1000 वोट डाले जा सकते हैं।
-ईवीएम से वोटों की गिनती कुछ घंटों में पूरी हो जाती है जबकि पहले यह प्रक्रिया कई दिनों तक चलती रहती थी
जब भाजपा और अन्य दलों ने भी किया था ईवीएम का विरोध
- फोटो : amar ujala
-चुनावों के बाद भाजपा पूरी तरह ईवीएम के समर्थन में है और विपक्षी दल विरोध में, लेकिन पहले ऐसा नहीं था भाजपा ने कई बार ईवीएम का विरोध किया
-2009 के लोकसभा चुनावों में हार के बाद तो भाजपा नेताओं ने ईवीएम के खिलाफ लंबी मुहिम चलाई थी। भाजपा नेता किरीट सौमया और जीवी नरसिम्हा ने तो इसके खिलाफ जमकर अभियान चलाया
-जीवी नरसिम्हा ने तो ईवीएम के खिलाफ Democracy at Risk,Can We Trust Our Electronic Voting Machines? नाम से किताब भी लिखी थी। जिसका प्रस्तावना खुद भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आड़वाणी ने लिखा
-किताब में किरीट सौमया और जीवीएम नरसिम्हा ने मांग की थी कि दुनिया के दूसरे विकसित देशों की तरह भारत में ईवीएम का प्रयोग बंद किया जाए या फिर इसके साथ अमेरिका की तरह Voter Verified Paper Audit Trail (VVPAT) व्यवस्था शुरू की जाए
-पूर्व में जनता पार्टी के और अब भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रमणयम स्वामी ने भी भी ईवीएम का खुलकर विरोध किया। स्वामी ने इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी याचिका
-पिछले साल तक पंजाब कांग्रेस प्रमुख कैप्टन अमरिंदर सिंह भी इसके खिलाफ आवाज उठाते रहे थे उन्हें पंजाब में रखी ईवीएम पर यकीन नहीं था इसलिए दूसरे राज्यों से ईवीएम मंगाने की मांग कर दी थी
-तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता तो चुनाव हारते ही साल 2001 में इसके खिलाफ मद्रास हाइकोर्ट में चली गई थीं।
-2010 में तेलुगु देशम पार्टी के नेता चंद्रबाबू नायडू ने भी इस पर सवाल उठाया था
-2010 में ही राज्यसभा में भाजपा और लेफ्ट के कुछ नेताओं ने ईवीएम के औचित्य और इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए उसकी पुख्ता जांच की मांग की थी।