रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से पहले सियासत जारी है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों के नेताओं ने कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता ठुकरा दिया है। इसके बाद से भाजपा विपक्ष पर हमलावर है। प्राण प्रतिष्ठा को भले ही अभी एक हफ्ते से ज्यादा का वक्त बचा है पर बीते पूरे हफ्ते इस पर राजनीति सुर्खियों में रही। इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में इसी मुद्दे पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार राहुल महाजन, गुंजा कपूर, राकेश शुक्ला, हर्षवर्धन त्रिपाठी, समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार और विनोद अग्निहोत्री मौजूद रहे।
कांग्रेस ने न्योता क्यों ठुकराया?
गुंजा कपूर: शायद निमंत्रण को मना करना भी एक तरह का संदेश है। अगर निमंत्रण में कांग्रेस के नेता जाते तो शायद उन्हें उन नेताओं के साथ मंच साझा करना पड़ता, जिन्होंने इस पूरे आंदोलन में एक सकारात्मक भूमिका निभाई। शायद कांग्रेस यह नहीं चाहती थी। कई बार ऐसा लगता है कि कांग्रेस इस पूरे मामले में दिग्भ्रमित है।
राहुल महाजन: कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को शायद गलत सलाह मिल रही है। एक तरफ कमलनाथ के बेटे नकुल नाथ चार करोड़ 31 लाख बार राम नाम लिखकर भिजवाने के बात कर रहे हैं और वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य अयोध्या जाने की बात कह रहे हैं, दूसरी तरफ गुजरात कांग्रेस के नेता खुलकर इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। इन सब चीजों के देखकर लगता है कि कांग्रेस का नेतृत्व गलत सलाह पर चल रहा है। कांग्रेस जिस वोटर की राजनीति कर रही है, क्या वो वोटर कांग्रेस को जिता सकता है। तो इसका जवाब होगा, यह बहुत मुश्किल है।
हर्षवर्धन त्रिपाठी: कांग्रेस का यह फैसला 80 फीसदी को भूलने का फैसला नहीं है। बहुत से हिन्दू वोटर हैं, जो कांग्रेस को वोट करते हैं। वरना बहुत से राज्यों में कांग्रेस नहीं जीतती। नेहरू जी का आइडिया ऑफ इंडिया था कि सोमनाथ मंदिर में सरकारी खर्च नहीं होना चाहिए। सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति को वहां नहीं जाना चाहिए। मुझे लगता है कि 2024 का चुनाव नेहरू के सोशलिज्म, आइडिया ऑफ इंडिया और भाजपा के हिंदुत्व की विचारधारा के बीच का चुनाव है।
राकेश शुक्ला: कांग्रेस दुविधा में दिखाई दे रही है। एक तरफ अयोध्या नहीं जाने की बात करते हैं, दूसरी तरफ दशहरे के दिन जब दिल्ली में रामलीला होती है तो उसमें सोनिया गांधी जाती हैं। कमलनाथ जब 15 महीने के लिए मुख्यमंत्री बने तो वे राम वन गमन पथ पर प्राथमिकता से काम कर रहे थे। क्षेत्रीय दलों के साथ अल्पसंख्यक और एक कोई जाति है। वहीं, कांग्रेस के पास कोई जाति नहीं बची है। 80 के दशक से लेकर अब तक कांग्रेस राम मंदिर के मुद्दे पर अपना पक्ष स्पष्ट नहीं कर पाई है। कांग्रेस दो नावों पर जो सवारी कर रही है, वो उसे पार नहीं लगा पाएंगे।
अवधेश कुमार: राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में कांग्रेस को जाना चाहिए था या नहीं, इस सवाल पर चर्चा होनी चाहिए। इस समय जो सोनिया और राहुल के सलाहकार हैं, वो किस तरह सलाह दे रहे हैं वो हम सब जानते हैं। उन्होंने यह बताया गया होगा कि जब नेहरू ने सोमनाथ का निमंत्रण ठुकरा दिया था तो आप अयोध्या क्यों जाएंगे? मुझे लगता है कि वर्तमान कांग्रेस का चरित्र भारत की उस धारा के विपरीत है, जो भारत के मूल में रहा है।
समीर चौगांवकर: मुझे लगता है कि धारा सिर्फ कांग्रेस ने नहीं तय की बल्कि भाजपा ने भी तय कर दी है। यह तय हो गया है कि यह चुनाव किस तरह होने जा रहा है। मुझे लगता है कि 2024 का लोकसभा चुनाव धर्म के मुद्दे पर होने जा रहा है। बाकी मुद्दे पीछे रहेंगे। आंकड़े बताते हैं कि भाजपा को सभी हिन्दू वोट नहीं देते। इसी तरह कांग्रेस को सिर्फ मुस्लिम वोट नहीं देते। उन्हें हिन्दुओं का वोट भी मिलता है। मुझे लगता है कि कांग्रेस ने किसी के लिए निर्देश नहीं जारी किया है कि कोई नेता वहां नहीं जाएगा। सिर्फ सोनिया गांधी ने मना किया है। पार्टी ने कोई लाइन नहीं खींची है। हालांकि, सोनिया का मना करना यह माना जा रहा है कि यह कांग्रेस की लाइन है। कांग्रेस को राजनीतिक रूप से यह सूट करता है कि उनका नहीं जाना ज्यादा बेहतर होगा।
विनोद अग्निहोत्री: राम मंदिर के मुद्दे को 1988 में ही भाजपा राजनीति में लेकर आई थी, जब पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में शामिल किया था। तब से ही यह राजनीतिक मुद्दा है। नेहरू का आइडिया था कि धर्म और राजनीति को साथ नहीं लाना चाहिए। कांग्रेस उस लाइन पर चलती दिख रही है। राम मंदिर से भाजपा को फायदा हुआ, लेकिन सिर्फ राम मंदिर के मुद्दे पर वह सत्ता में आई, यह मैं नहीं मानता हूं। भाजपा आने वाले चुनाव में विकास और हिन्दुत्व का पैकेज लेकर इस चुनाव में आएगी। कांग्रेस को इसका मुकाबला करना है। इस देश में एक बहुत बड़ा वर्ग है, जो नहीं चाहता है कि धर्म और सरकार और दोनों एक दूसरे के साथ चलें। ऐसा मानने वालों में हिन्दू भी हैं और मुसलमान भी हैं।