लोकसभा चुनाव का एलान किसी भी दिन हो सकता है। इससे पहले राजनीतिक दल अपनी तैयारियों में जुट गए हैं। बीते हफ्ते भाजपा उम्मीदवारों की पहली सूची को लेकर चर्चा जारी रही। तमाम चर्चाओं और चुनावी मंथन के बाद भाजपा ने अपनी पहली सूची शनिवार शाम जारी भी कर दी। इसमें 195 नामों का एलान किया गया है। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, हर्षवर्धन त्रिपाठी, विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।
रामकृपाल सिंह: जो जीत दिला सकता है, उसी को पार्टी टिकट देगी। किसी ने कितना भी अच्छा काम किया हो, कुछ न कुछ नकारात्मक भी उसके साथ जुड़ता है। इसलिए कई बार नया चेहरा देने पर वह चेहरा उस नकारात्मकता के बोझ को लेकर नहीं आता है। 2014 से 2024 के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने जो काम किया, उसके बाद वह चौंकाने की स्थिति में हैं।
मोदी अगर 400 का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं तो एक-एक सांसद की परफॉर्मेंस रिपोर्ट वो लेकर बैठे होंगे। चेहरा काम करता है, लेकिन जहां सिर्फ मोदी का चेहरा काम कर रहा हो, उसे देखते हुए भाजपा के पास यह आजादी है कि वो जितना चाहे, उतनी सीटों पर चेहरे बदल सकती हैं। राहुल गांधी की पहली यात्रा के बाद तीन विधानसभा चुनाव हुए, उसके नतीजे आ चुके हैं। यह एक उदाहरण है। भविष्य में अगर राहुल की यात्रा का कोई सकारात्मक असर होगा तो वो लोकसभा चुनाव के नतीजों में दिखेगा।
पूर्णिमा त्रिपाठी: असंतुष्ट होने का सवाल भाजपा में नहीं रह गया है। पिछले चुनावों में जो नेता टिकट कटने पर असंतुष्ट हुए, उसका कोई खास फर्क नहीं पड़ा। इसे देखते हुए कह सकते हैं कि किसी नेता का टिकट कटने पर उसके असंतुष्ट होने से पार्टी को कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। पिछली बार प्रधानमंत्री ने 300 सीटों का नारा दिया था तो पार्टी की 303 सीटें आई थीं। इस बार उन्होंने 370 सीटों का नारा दिया है। ऐसे में 99 फीसदी सीटों पर ऐसे नाम होंगे, जो जीत दिला सकते हैं। भले वो भाजपा के चेहरे हों या किसी दूसरे दल से आए सीट जिताऊ चेहरे हों।
भाजपा इस बार सहयोगियों के लिए भी बहुत ज्यादा सीटें छोड़ने के मूड में नहीं है। उत्तर प्रदेश में जो सहयोगी हैं, उन्हें एक-दो सीट से ज्यादा सीट नहीं देगी। इसी तरह बिहार में भी भाजपा सहयोगियों को 2019 जितनी सीटें नहीं देगी। आज की तारीख में विपक्ष का न कोई नरैटिव दिख रहा है, न ही कोई रणनीति दिख रही है। विपक्ष की तरफ से बहुत कमजोर रणनीति दिख रही है। विचारधारा के स्तर पर भी मजबूती से लड़ाई नहीं लड़ी जा रही है। विपक्ष साफ तस्वीर नहीं पेश कर पा रहा है, जबकि मोदी ने तस्वीर साफ कर दी है।
हर्षवर्धन त्रिपाठी: नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति में असहमति को सहमति में बदलने का ऐसा उदाहरण पेश कर दिया है, जिसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है। 2014 में बात कही जाती थी कि भाजपा ऐसी पार्टी है जो 160 से 170 सीटें ही अपने दम पर जीत पाएगी। बाकी सहयोगियों की मदद से भाजपा सरकार बना सकती है, लेकिन 2014 में भाजपा ने अपने दम पर बहुमत हासिल किया। इसके बाद 2019 में भी पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ आई। पूर्ण बहुमत होने के बाद भी भाजपा ने सहयोगियों को जगह दी है। उन्हें छोड़ा नहीं गया।
लोकतंत्र लोगों की आवाज के बीच से निकलता है। जनता ने यह देखना शुरू किया कि कौन-सा नेता है कि जो कहता है, वह करता है। यह सिर्फ नरेंद्र मोदी की बात नहीं है। नीतीश कुमार को देखिए, भले उनके ऊपर पलटी मारने का आरोप लगते हैं फिर भी वो सत्ता में आते रहे हैं। ममता बनर्जी को देख लीजिए।
विनोद अग्निहोत्री: मौजूदा भाजपा में वरिष्ठ नेता केवल दो-तीन ही हैं। नरेंद्र मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा। उसके अलावा किसी भी भाजपा नेता को वरिष्ठ होने का गुमान नहीं होना चाहिए। भाजपा के अंदर तीन तरह का अनुशासन है। पहला संघ का, दूसरा पार्टी का और तीसरा सत्ता का। आज की भाजपा में सत्ता का अनुशासन लागू है।
नरेंद्र मोदी यह जानते हैं कि उनका वोट किनारे तक तो पहुंचा सकता है, लेकिन उसे और पुख्ता करने की कोशिश की जा रही है। जीतन राम मांझी, चिराग पासवान, पशुपति पारस से लेकर अनुप्रिया पटेल, ओम प्रकाश राजभर जैसे नेता सीटों की संख्या के लिहाज से भले ज्यादा फर्क नहीं डाल सकते हो, लेकिन ये जो जोड़ सकते हैं, उसे भी अपने साथ भाजपा जोड़ना चाहती है।
जहां तक यह सवाल है कि विपक्ष का नरैटिव क्यों नहीं बन पा रहा है तो हमेशा एक दौर नहीं रहता है। दौर बदलते रहते हैं। यह कह देना कि अगले 20 साल तक कोई नहीं आ सकता है, मैं इसमें विश्वास नहीं करता हूं। बेरोजगारी का सवाल आज भी उतना ही बड़ा है। हम उसे नहीं देखते हैं। किसानों का असंतोष सामने आया। संदेशखाली की घटना हो या मणिपुर की घटना हो, ये मुद्दे भी हैं। विपक्ष इन मुद्दों को जनता तक कैसे ले जा रहा है, यह देखना होगा। प्रधानमंत्री मोदी कि एक विशेषता है कि वो गोलपोस्ट बदलते रहते हैं। इससे नैरेटिव भी बदलता रहता है। नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक जो भी बड़े नेता रहे हैं, वो भविष्य का विजन देते रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी अब 2047 का विजन दे रहे हैं।
अनुराग वर्मा: 370 और 400 का जो आंकड़ा दिया गया है, उस पर चर्चा हो सकती है, लेकिन सरकार बनाने पर चर्चा बेमानी है। ये 2029 के चुनाव के लिए ढांचा तैयार करने वाला चुनाव भी है। भाजपा को 2029 के चुनाव के लिए एक नया नेतृत्व तैयार करना होगा। विपक्ष बहुत कमजोर दिख रहा है। इस समय भाजपा प्रयोग कर सकती है। ये प्रयोग उन सीटों पर हो सकते हैं, जो कमजोर सीटें हैं। नया नेतृत्व लाने के लिए उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन सकते हैं।
विपक्ष आरोप लगाता है कि आप अगर इतने मजबूत हैं तो फिर उनके नेताओं को तोड़कर क्यों ला रहे हैं। मुझे लगता है कि यह इसलिए नहीं हो रहा है कि भाजपा की स्थिति कमजोर है, बल्कि यह एक तरह का संदेश देने की कोशिश है। संदेश इस बात का कि विपक्ष के पास नेता और विजन नहीं है और यह नेता अपने नेतृत्व से नाराज होकर भाजपा के साथ आ रहे हैं।