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खबरों के खिलाड़ी: लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी गठबंधन में सीटों का बंटवारा कब तक होगा, कहां फंसा पेंच?

Sat, 13 Jan 2024 04:53 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Khabron Ke Khiladi:आखिर विपक्षी गठबंधन में कहां पेंच फंसा है? सीटों के बंटवारे में इतनी देरी क्यों हो रही है? सीट बंटवारा किस राज्य में किस तरह होगा? इन सवालों पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार, राकेश शुक्ला, गुंजा कपूर और विनोद अग्निहोत्री मौजूद रहे। 
 
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खबरों के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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लोकसभा चुनाव का एलान होने में तीन महीने से भी कम का वक्त बचा है। इससे पहले विपक्षी गठबंधन के बीच सीटों के बंटवारे की खबरें लगातार सुर्खियां बटोर रही हैं। बीते हफ्ते भी सीट बंटवारे पर बातचीत होती रही। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच अलग-अलग दौर की बातचीत हुई। वहीं, शनिवार को 14 दलों के नेताओं ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इस पर चर्चा की।

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आखिर विपक्षी गठबंधन में कहां पेंच फंसा है? सीटों के बंटवारे में इतनी देरी क्यों हो रही है? सीट बंटवारा किस राज्य में किस तरह होगा? इन सवालों पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार, राकेश शुक्ला, गुंजा कपूर और विनोद अग्निहोत्री मौजूद रहे। 

अवधेश कुमार: कांग्रेस विपक्षी गठबंधन को ज्यादा महत्व नहीं दे रही है। कांग्रेस की मानसिकता है कि राहुल गांधी देश के दूसरे बड़े नेता हैं। अभी विपक्षी गठबंधन में संयोजक का मामला अटक गया है। जिस तरह से केसी त्यागी ने बयान दिया, उससे दिखाई देता है कि नीतीश कुमार अपने स्तर पर दबाव की राजनीति कर रहे हैं। गठबंधन में जिस तरह की अविश्वसनीयता है, उससे सीट बंटवारा बहुत मुश्किल है। हालांकि, कुछ राज्यों में यह जरूर हो जाएगा। जैसे बिहार में यह हो जाएगा। तमिलनाडु में यह हो जाएगा। जहां पहले से इन दलों में गठबंधन था। दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में गठबंधन हो सकता है, लेकिन पंजाब में यह मुश्किल दिखाई देता है। 
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राकेश शुक्ला: कांग्रेस तराजू में मेंढक तौलने का जोखिम ले रही है। बिहार के सहयोगी कांग्रेस को दो सीट देने की बात करते हैं, बंगाल में भी यही कहा जा रहा है। यही स्थिति उत्तर प्रदेश में दिखाई दे रही है। देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए यह स्थिति सोचनीय है। दरअसल, सभी क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस से ही जन्म ली हैं। कांग्रेस का बड़ा वोट बैंक इन दलों के पास है। गठबंधन के पीछे फंसे पेंच का एक बड़ा कारण यही है। उन्हें डर है कि कहीं कांग्रेस विस्तार न कर जाए। पंजाब में कांग्रेस नहीं चाहती है कि समझौता हो क्योंकि वहां का जाट, सिख, जो अकाली दल के साथ था, वह आम आदमी पार्टी के साथ गया। वहीं, दलित सिख आज भी कांग्रेस के साथ हैं। बंगाल में ममता नहीं चाहती हैं कि गठबंधन हो। 

विनोद अग्निहोत्री: हम ग्लास को आधा खाली ही क्यों देखते हैं? आधा ग्लास भरा हुआ भी तो है। एनडीए में एक बड़ा चेहरा है। वहीं, इंडिया गठबंधन में सब नेता अपने-अपने राज्य के क्षत्रप हैं। दोनों गठबंधनों के स्वरूप में अंतर है। केरल हो बंगाल हो या पंजाब हो, यहां परिस्थितियां अलग हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ इंडिया गठबंधन में यह स्थिति है। एनडीए में भी स्थिति देख लीजिए। 

महाराष्ट्र में शिंदे कह रहे हैं कि हम 23 सीट पर लड़ेंगे। अजित पवार 19 सीट पर लड़ने की बात कह रहे हैं। तो क्या भाजपा सिर्फ छह सीटों पर लड़ेगी क्या? ऐसे ही ओम प्रकाश राजभर बिहार में चार सीटें मांग रहे हैं। इसकी कोई बात नहीं होती। हालांकि, सभी को पता है कि नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मिलेंगे तो इस गठबंधन में सीटों का बंटवारा हो जाएगा। कोई भी टीम मैदान में उतरती है तो वह जीतने के लिए उतरती है। 1983 में जब भारत और वेस्टइंडीज के बीच फाइनल खेला गया था, तब कौन कहता था भारत जीतेगा। इसके बाद भी भारत ने लड़ाई लड़ी और जीती। कांग्रेस के साथ यह विडंबना रही है कि वह जिस क्षेत्रीय पार्टी के साथ गठबंधन करती है, वह पार्टी कांग्रेस का स्पेस ले लेती है। वहीं, भाजपा के साथ उल्टा रहा है। भाजपा जहां क्षेत्रीय दलों के साथ समझौता करती है, वहां वह क्षेत्रीय दल का स्पेस लेती है। बिहार में उसने नीतीश के साथ गठबंधन किया, आज नीतीश से बड़ी पार्टी भाजपा है। महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन किया, आज महाराष्ट्र में शिवसेना से बड़ी पार्टी भाजपा है। मुझे लगता है कि जनवरी के अंत तक स्थिति साफ हो जाएगी। 

गुंजा कपूर: बीते चुनावों के नतीजे देखते हैं तो पता चलता है कि गठबंधन के दलों में विश्वास की कमी है। सबकी महत्वाकांक्षाएं हैं। सभी दल पिछले 10 साल से सत्ता से बाहर हैं। सभी को लगता है कि सत्ता में नहीं आए तो पार्टियों के लिए काफी मुश्किल होगी। विपक्ष का मजबूत होना हमारे लोकतंत्र के लिए बहुत जरूरी है। मौजूदा समय में देखिए इतने बड़े-बड़े बिल पास हो जाते हैं और उस पर चर्चा के लिए कोई होता ही नहीं है।

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