लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद से उत्तर प्रदेश सरकार में खींचतान की खबरें लगातार आ रही हैं। भाजपा की सीटें कम होने के बाद पार्टी और सरकार में मंथन जारी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को लेकर खबरें लगातार आ रही हैं। सपा प्रमुख अखिलेश यादव तंज कस रहे हैं। उनके और केशव प्रसाद मौर्य के बीच भी सोशल मीडिया पर नोकझोंक का दौर जारी है।
इन सबके बीच उत्तर प्रदेश भाजपा के सभी बड़ी चेहरे इस वक्त दिल्ली में हैं। उत्तर प्रदेश में जारी इसी उठापटक पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी और राकेश शुक्ल मौजूद रहे।
समीर चौगांवकर: यह कोई पहली बार दवाब की राजनीति नहीं थी। न ही यह पहली बार है कि उत्तर प्रदेश भाजपा में गुट बने हुए हैं। ये जरूर है कि 2024 के नतीजों के बाद यह गुटबाजी हावी दिखाई दे रही है। एक वर्ग है जो इस परिणाम का ठीकरा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर फोड़ना चाहता है। एक बात साफ है कि कितना भी संगठन के अंदर विवाद हो, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ बने रहेंगे। 2027 का विधानसभा चुनाव योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। मुझे यह देखना है कि क्या केशव प्रसाद मौर्य अभी भी योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट में काम करते रहेंगे या संगठन में वापस जाएंगे। अब दिल्ली में दोनों धड़ों की प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद मुझे लगता है कि जल्द ही इस पर विराम लगेगा।
राकेश शुक्ल: यदि नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ साथ बैठेंगे तो क्या इस विषय में बात करेंगे? मुझे लगता है कि ऐसा नहीं होगा। दोनों के बीच राजनीतिक बातें नहीं होंगी। यह जरूर है कि सरकार के कामकाज को लेकर बात होगी। केशव प्रसाद मौर्य और योगी आदित्यनाथ के बीच तकरार का यह पहला मौका नहीं है। योगी आदित्यनाथ के सामने जब भी कोई आया है, तब उन्होंने अपनी ताकत का अहसास कराया है। सारी मशक्कत केंद्र को करनी है कि केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक को कहां समायोजित किया जाए।
विनोद अग्निहोत्री: 1998-99 में भी इसी तरह की स्थिति थी। जब अटल बिहार वाजपेयी और कल्याण सिंह के बीच टकराव हुआ था। यही स्थिति 2009 के बाद गुजरात में भी आई थी। जब भाजपा की सीटें घट गईं थीं। 1998-99 में भाजपा ने कल्याण सिंह को हटा दिया था। 2009 में नरेंद्र मोदी नहीं हटाए गए थे। आज नरेंद्र मोदी कहां हैं, यह सभी को पता है। संगठन चाहे तो योगी आदित्यनाथ को हटा सकता है, लेकिन इसके बाद में क्या होगा उसका जवाब नहीं है। आप योगी आदित्यनाथ से सहमत या असहमत हो सकते हैं। इसके बाद भी आपको मानना होगा कि योगी आदित्यनाथ की अपनी लोकप्रियता है।
रामकृपाल सिंह: यह बहुत स्वाभाविक है। सारी राष्ट्रीय पार्टियों में इस तरह की चीजें होती हैं। जब हार होती है तो हारे हुए कप्तान की सभी बातें गलत लगती हैं। सिर्फ उत्तर प्रदेश क्यों, बंगाल में क्या सीटें नहीं घटीं। महाराष्ट्र और राजस्थान में आपसे वोटर क्यों दूर हुआ। इस बारे में भी केंद्र सोचेगा। टिकट में किसकी चली और किसकी नहीं चली, इस पर भी बात होती। राजनीतिक दल में अगर उठापटक चले तो यह जनता के हित में है।
पूर्णिमा त्रिपाठी: आलाकमान के सामने बहुत बड़ी चुनौती है। उत्तर प्रदेश में जब हिंदुत्व का नरेटिव नहीं चला तो आलाकमान के सामने चुनौती तो बढ़ेगी ही। इसलिए यह रस्साकशी चल रही है। आलाकमान यह देख रहा है कि सिर्फ हिंदुत्व से ही जीत नहीं मिल सकती है। इसलिए वह अखिलेश के पीडीए वाले फॉर्मूले में सेंध लगाना चाहता है। यह सब 2027 के चुनाव तक चलता रहेगा।