इस हफ्ते राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन की तरफ से राज्यसभा में दिए एक बयान पर जमकर बवाल हुआ। वहीं, कॉमेडियन कुणाल कामरा के एकनाथ शिंदे पर किए गए तंज पर भी हंगामा मचा हुआ है। इन सबके बीच राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी भी चर्चा में रही। इन मामलों के बीच अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर चर्चा छिड़ी है। एक तरफ अभिव्यक्ति की आजादी और दूसरी तरफ कब, कहां, क्या और कैसे बोलना है, इस पर भी सवाल हो रहा है।
राणा सांगा को लेकर इस तरह की बात क्यों कही गई? इसके पीछे किस तरह की सियासत है? इन्हीं सवालों पर इस हफ्ते के ‘खबरों के खिलाड़ी’ में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी और अवधेश कुमार मौजूद रहे।
अवधेश कुमार: देश में जिसे पूजा नहीं जाना चाहिए, जब उसे पूजा जाने लगता है तो वो देश उसी तरह से खत्म हो जाता है जैसे पेड़ से सूखे पत्ते खत्म हो जाते हैं। रामजी लाल सुमन को छोड़ दीजिए, अबु आजमी को छोड़ दीजिए, लेकिन अखिलेश यादव को क्या पड़ी थी इस तरह का बयान देने की। देश के मुस्लिम इतिहासकारों ने भी इतिहास लिखने में थोड़ी इमानदारी बरती। संपूर्ण क्रांति पर जयप्रकाश नारायण के विचार पढ़िए। अब हर चीज को विवादास्पद बनाया जा रहा है।
विनोद अग्निहोत्री: राणा सांगा पर जो रामजी लाल सुमन ने बोला वो निंदनीय है। जाति का एंगल इस देश में आएगा ही आएगा। जब राहुल गांधी ने मोदी उपनाम पर भाषण दिया तो क्या भाजपा ने इसमें जाति का एंगल नहीं लाई? इसी तरह रामजी लाल सुमन के मामले में खरगे से पहले अखिलेश यादव ने इसे दलित एंगल दिया। अगर वो नहीं देते तो हमें आश्चर्य होता। हर दल अपनी राजनीति के लिए इस तरह के एंगल ढूंढता है। ये भी सही है कि इतिहास में इस तरह की लड़ाइयां होती रही हैं। राणा कुंभा को किसने मारा? तत्कालीन इतिहासकारों ने ईमानदारी से लिखा है। राणा सांगा राष्ट्र नायक हैं। वो सिर्फ हिंदुओं के नायक नहीं हैं, बल्कि पूरे देश के नायक हैं। रामजी लाल सुमन को भी इतिहास पढ़ना चाहिए और अपने कहे पर खेद भी जताना चाहिए।
रामकृपाल सिंह: आजादी को लेकर पूरा दुनिया में अलग-अलग व्याख्या है। इसे क्वांटिफाई नहीं किया जा सकता है। इंसान कोई भी काम कर सकता है, उसे उस काम की कीमत स्वयं चुकानी है। और कोई इसे नहीं चुकाएगा। आजादी और अपमान दोनों को समझना होगा। जिस तरह की तू-तड़ाक का रामजी लाल सुमन ने इस्तेमाल किया, वो सुविचारित था। ये बहुसंख्यक समाज के बीच की दरारें चौड़ी करने की कोशिश है।
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पूर्णिमा त्रिपाठी: यह बिलकुल सोची-समझी स्क्रिप्ट के मुताबिक चल रहा है। अगर भाजपा धर्म की राजनीति करती है तो समाजवादी पार्टी जाति पर राजनीति करती है। अबु आजमी के बयान के बाद जब योगी ने बयान दिया तो अखिलेश पिछड़ते हुए दिखे। इसके बाद उन्होंने रामजी लाल सुमन को आगे कर दिया। ये पूरी तरह से सोची-समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है।
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समीर चौगांवकर: इतिहास में जितने भी महापुरुष हैं वो पूरे देश के महापुरुष हैं। वो किसी धर्म या जाति के नायक नहीं हैं। अंबेडकर के बारे में कुछ कहा तो कहा जाता है कि दलितों का अपमान हो गया। राणा सांगा के बारे में कुछ कहा तो कहा जाता है कि राजपूतों का अपमान हो गया। राजनीति के अंदर जो कदम उठाए जा रहे हैं, वो केवल राजनीतिक नफा-नुकसान के हिसाब से उठाए जा रहे हैं। जाति की राजनीति राजनीतिक दलों के अंदर घर कर गई है।