कर्नाटक में सियासत इन दिनों "दूध की राजनीति" के साथ आगे बढ़ रही है। कांग्रेस ने इस पूरे मुद्दे को एक नई दिश देने के लिए बड़ी रणनीति बनाई है। कांग्रेस पार्टी के नेता जयराम रमेश कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी की "वन नेशन वन मिल्क" की योजना को लागू नहीं होने दिया जाएगा। वह कहते हैं कि कर्नाटक में नंदिनी दूध राज्य के किसानों की देन है। भारतीय जनता पार्टी राज्य के किसानों के साथ ना सिर्फ अन्याय कर रही है बल्कि यहां के किसानों की मेहनत को भी अमूल की एंट्री के साथ खत्म करना चाहती है। कांग्रेस पार्टी से जुड़े नेताओं का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी दूध में भी विकेंद्रीकरण को समाप्त कर केंद्रीकरण कर रही है।
कर्नाटक के राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विपक्ष के पास दूध का एक ऐसा मुद्दा हाथ लगा है जिस पर वह न सिर्फ कर्नाटक के किसानों को बल्कि स्थानीय जनता को भावनात्मक तौर पर जोड़ने की कोशिश की जा रही है। राजनीतिक विश्लेषक सुदर्शन कहते हैं कि कर्नाटक मिल्क फेडरेशन ने राज्य के ज्यादातर इलाकों में किसानों से सीधे तौर पर अपना नेटवर्क बनाया है। इसी नेटवर्क के माध्यम से वह उनसे दूध लेकर समूचे कर्नाटक और देश के कुछ हिस्से में उसकी आपूर्ति करता है। उनका कहना है कि यही एक बड़ी वजह है कि अमूल के कर्नाटक में आने की सुगबुगाहट से कांग्रेस ने बड़ा सियासी हथियार बनाने की योजना तैयार कर की है।
कांग्रेस पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि लाल बहादुर शास्त्री के दौर में जब देश की डेयरी उद्योग को बढ़ावा दिया जा रहा था तभी से अलग-अलग राज्यों की प्रमुख दुग्ध उत्पादन समितियों को नए आयाम मिलने शुरू हुए थे। उनका कहना है कि कांग्रेस शुरुआत से ही किसानों के हितों में सहकारी समितियों समेत दुग्ध उत्पादन समितियों को न सिर्फ ताकत दे रही थी बल्कि विकेंद्रीकरण के साथ अलग-अलग राज्यों में ऐसी समितियों को मजबूत भी किया जा रहा था। जयराम रमेश कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी अपनी नीतियों से वन नेशन वन मिल्क को बढ़ावा देना चाहती है।
कर्नाटक कांग्रेस पार्टी से जुड़े नेता एन रमेश कहते हैं कि सहकारी समितियों में किसी तरीके की प्रतिस्पर्धा का कोई मतलब होना ही नहीं होना चाहिए। उनका आरोप है कि अमूल की दूसरे राज्यों में आमद से न सिर्फ लोगों को महंगा दूध मिलने लगता है बल्कि किसानों को उस स्तर से कोई लाभ भी नहीं होता है। वह कहते हैं कि इसी वजह से कांग्रेस की जिला इकाई से लेकर नगर इकाई अब कर्नाटक राज्य के सभी किसानों से संपर्क कर भारतीय जनता पार्टी के इस षड्यंत्र को साझा कर रही है। पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय आलाकमान से भी इस पूरे मुद्दे को कर्नाटक में गांव गांव में किसानों तक पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं।
राजनीतिक विश्लेषक सुदर्शन का कहना है कि कर्नाटक में किसानों की अपनी समस्याएं हैं। केंद्र और राज्य सरकार की ओर से जिन समस्याओं का निदान किया जाना चाहिए उसको किया भी जा रहा है। लेकिन किसानों की किसी भी दुखती रग को छेड़ना और उसके आधार पर मुद्दा बनाना आने वाले विधानसभा के चुनावों में बड़ा असर डाल सकता है। वो कहते हैं कि फिलहाल कर्नाटक में दूध एक मुद्दा बनाया जा रहा है। हालांकि उनका कहना है कि दूध का मुद्दा किस तरह चुनावों में असर करेगा यह तो चुनावों के परिणाम बताएंगे। लेकिन कर्नाटक के चुनावों में दूध का मुद्दा पहली बार सामने आया है, और उसके आधार पर विपक्षी रणनीतियां बना रहे हैं।