1999 तक पश्चिमी देशों में भारत की ज्यादा पूछ नहीं थी। हमें कई देश सैन्य और कूटनीतिक तौर पर कमजोर समझते थे। परमाणु परीक्षण के बाद तो अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कुछ हद तक रूस भी खिलाफ था। आर्थिक प्रतिबंध लगे। अर्थव्यवस्था कमजोर व विदेशी मुद्रा भंडार सीमित था। पूर्व विदेश सचिव और कूटनीतिज्ञ कंवल सिब्बल कहते हैं, तत्कालीन पाक सेनाध्यक्ष जनरल परवेज मुशर्रफ ने भारत की कमजोर हैसियत का फायदा उठाने की रणनीति बनाई।
तत्कालीन पीएम अटलबिहारी वाजपेयी के शांति प्रस्ताव को भारत की कमजोरी माना। इसके लिए सुनियोजित घुसपैठ कराकर हमारे इलाकों पर कब्जा जमा लिया। लेकिन उसने हमारी सेना की प्रतिबद्धता व कूटनीतिक क्षमता को हल्के में लेने की भूल कर दी, जिसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ा। सिब्बल के अनुसार, 21 साल में रणनीतिक और सामरिक रूप से बड़ा फर्क आया है। हमारी कमजोरियां पुरानी बात हो गई हैं। अब भारत से भिड़ना आसान नहीं है।
बातचीत के साथ सीमा पर दबाव बनाने की दुश्मन की रणनीति पुरानी पड़ गई है। आज पाक के प्रति नरम रहे अमेरिका से हमारे प्रगाढ़ संबंध हैं। सैन्य साझेदारियां बढ़ी हैं। फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और जापान से लॉजिस्टिक और सैन्य समझौतों में विस्तार हुआ है। यानी रक्षा और कूटनीति, दोनों में मजबूत रिश्ते बने हैं। इससे न सिर्फ पाक बल्कि चीन को भी साधने में मदद मिली है। अब भारत से भिड़ने से पहले दुश्मन नतीजे के बारे में 100 बार सोचता है।
पाक ने चली थी मुजाहिदीन चाल पर हुआ बुरा हाल...