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कानों देखी: जयंत आडवाणी नहीं खा पाए राजनीति का रसगुल्ला

Sat, 30 Mar 2019 01:40 AM IST
अनिल पांडेय शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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जयंत आडवाणी (फाइल)
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लालकृष्ण आडवाणी के पुत्र की दिली तमन्ना थी कि राजनीति का रसगुल्ला खाएं। बता दें प्रतिभा आडवाणी की तुलना में जयंत के प्रधानमंत्री से अच्छे रिश्ते हैं। आडवाणी और जयंत में बहुत कुछ बस औपचारिक भर है, वहीं बेटी प्रतिभा में आडवाणी की जान बसती है। इसके सामानांतर भावुक, नरम दिल की प्रतिभा प्रधानमंत्री के साथ उतनी सहज नहीं हैं। सूत्र बताते हैं एक दूरी सी है। आडवाणी जी के पास यह प्रस्ताव गया कि उनकी राजनीतिक विरासत कौन लेगा? प्रस्ताव की भूमिका कुछ इस तरह थी कि जयंत के हाथ लग जाए। बताते हैं आडवाणी जी सब कुछ भांप गए और टका सा एक लाइन का जवाब दिया कि उनकी राजनीतिक लिगेसी नहीं है। 

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आडवाणी के यह लाइन लेते ही जयंत के राजनीतिक रसगुल्ले का स्वाद लेते रह गए। आप समझ सकते हैं कि इसके दो माने थे। एक तो यह कि आडवाणी जी चुनाव नहीं लड़ेगे और दूसरा गांधी नगर से भाजपा उम्मीदवार तय कर सकती है। बस भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को आडवाणी जी की विरासत मिल गई।

रामलाल ने निभाई जिम्मेदारी

भाजपा के संगठन मंत्री राम लाल ने बखूबी जिम्मेदारी निभाई। आडवाणी के करीबी बताते हैं कि आडवाणी के स्थान पर अन्य को चुनाव लड़ाने की सूचना भी संगठन मंत्री ने ही उन्हें दी और मार्ग दर्शक मंडल के दूसरे सदस्य तक भी उन्होंने ही बात पहुंचाई। राम लाल चाहते थे कि दोनों मार्ग दर्शक मंडल दल के नेता लिखित में दे दें कि वह चुनाव नहीं लड़ना हैं। ताकि कार्यकर्ताओं को सही संदेश दिया जा सके और विरोधी भी इस पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की भाजपा का तंज न कसें। लेकिन न केवल आडवाणी ने इस पर टका सा जवाब दे दिया, बल्कि डा. जोशी ने भी राम लाल को उल्टे पांव लौटा दिया। 
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जोशी ने तो यह सूचना देने के लिए राम लाल को भेजने के निर्णय पर भी आपत्ति जताई। दोनों वरिष्ठ नेताओं को लग रहा है कि उन्होंने खून-पसीने से भाजपा को सींचा और उन्हें चुनाव न लड़ाने की सूचना भाजपा अध्यक्ष भी देना जरूरी नहीं समझ रहे हैं। बताते हैं अब यहां भी डैमेज कंट्रोल की तैयारी है। देखिए आगे होता है क्या?

चच्चा विजयश्री का आशीर्वाद दे दो

अक्षय यादव ने चाचा शिवपाल से जीत का आशीर्वाद मांग लिया। शिवपाल का राजनीतिक झगड़ा अक्षय के पिता रामगोपाल से है। लिहाजा थोड़ा असमंजस में पड़ गए। लेकिन शिवपाल कुछ भी हों। मझे हुए खिलाड़ी हैं। उनके कार्यालय के सूत्र की माने तो वह चुनाव में अक्षय को ही चुनौती दे रहे हैं। इसलिए मुस्कराकर बानगी दिखाई और आगे बढ़ गए। इसका अर्थ भी गजब का निकाला जा रहा है। शिवपाल के समर्थकों का कहना है कि चच्चा ने भतीजे को चुनाव बीतने के बाद आशीर्वाद देने का संदेश दिया है। वहीं अक्षय का कहना है कि उन्हें सबकुछ मिल गया है। वैसे भी समाजवादी पार्टी और शिवपाल की नई समाजवादी पार्टी के लिए चचा-भतीजे की यह लड़ाई काफी दिलचस्प बनी है।

कांग्रेस को प्रियंका से काफी भरोसा, उ.प्र. में लहलहाएगी फसल

कांग्रेस को उप्र. में अभी मजबूत उम्मीदवार भले न मिल रहे हों लेकिन प्रियंका ने जिस तरह से लोगों से जुड़ना शुरू किया है, उससे उम्मीदें बढ़ गई है। राहुल गांधी का कार्यालय उ.प्र. में लोकसभा चुनाव में डेढ़ दर्जन सीट की उम्मीद लगाए बैठा है। वहीं कांग्रेस के एक महासचिव को एक दर्जन में कोई खोट नहीं नजर आ रहा है। भाजपा के एक उ.प्र. के केन्द्रीय मंत्री के राजनीतिक सलाहकार को 8-9 सीटों पर कांग्रेस मजबूती से लड़ती दिखाई दे रही है।

बसपा प्रमुख मायावती के एक दफ्तरी की राय है कि प्रियंका एक-दो प्रतिशत तक कांग्रेस का वोट बढ़ा देंगी, लेकिन सीटें एक दो आएंगी। इन सबके बीच में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के अंदरुनी रिश्ते थोड़ा मधुर हुए हैं। अखिलेश के मित्रों में कहे जाने वाले सूत्र की मानें तो कांग्रेस ने चाचा शिवपाल को अभी तक घास नहीं डाली है। इसके पीछे की वजह अखिलेश के साथ समीकरण को बनाए रखना है। अब कौन समझाए कि भाई यही तो राहुल गांधी की राजनीतिक कूटनीति है।

कुछ राहुल पिघले, कुछ तेजस्वी

बिहार का महागठबंधन कोई आसान नहीं था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और राजद के तेजस्वी के लिए जोरदार सिरदर्द। कांग्रेस में शामिल हुए कीर्ति आजाद और शत्रुघ्न सिन्हा नब्बे के दशक में बिहार में लाल कृष्ण आडवाणी के साथ मिलकर बिहार में भाजपा के राजनीति की जमीन सींच रहे थे। पूर्व मुख्यमंत्री भगवत झा आजाद के पुत्र ने कांग्रेस में शामिल होते ही तमाम कांग्रेसी नेताओं के साथ मिलकर दबाव बढ़ा दिया था। रंजीता रंजन अलग, पटना साहिब के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा अलग। पप्पू यादव भी एक फैक्टर। तारिक अनवर की अलग चिंता। यही हाल राजद का भी। सीट चालीस और दाल पूरे गांव को बंटनी है। लेकिन बताते हैं कि राहुल और तेजस्वी दोनों महागठबंधन के लिए प्रतिबद्ध थे और काफी कड़ी मशक्कत के बाद आखिरकार यह फाइनल हो ही गया।

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