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बस्तर के कमलू को नहीं पता कौन हैं मोदी, राहुल गांधी?

Thu, 17 Mar 2016 06:56 PM IST
विनोद वर्मा/अमर उजाला, बस्तर से लौटकर
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छत्तीसगढ़ की राजधानी तक नहीं देखी कमलू ने - फोटो : अमर उजाला
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छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाके बस्तर में रहने वाला कमलू आठवीं पास है। वह हिंदी बोल, समझ और पढ़ लेता है। एबीसीडी, ए फॉर एप्पल, बी फॉर बैट जितनी अंग्रेजी भी जानता है। आदिवासी बोली हल्बी उसकी मातृ भाषा है। लेकिन वह छत्तीसगढ़ी नहीं जानता। 
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जैसा कि वह बताता है, उसकी उम्र 18 बरस है। हालांकि उसे देखकर लगता नहीं कि वह 18 बरस का हो चुका होगा। शहरी बच्चों से तुलना करें तो वह 12-13 बरस का ही लगता है। लेकिन आदिवासी इलाकों के परिवारों के बच्चों के लिहाज से यह सामान्य सी बात है। गरीब होना मानों उनका प्रारब्ध है। इसलिए पीढ़ियों से चला आ रहा कुपोषण उन्हें आम भारतीयों की कद काठी का भी नहीं होने देता।  

रायपुर से जगदलपुर जाते वक़्त कोंडागांव के एक ढाबे पर वह बैरे का काम करता है। लेकिन ढाबे का खाना भी उसे बदल नहीं पाता क्योंकि ढाबे पर भी वह चावल और एक सब्जी के अलावा कुछ नहीं खाता। शायद और कुछ मिलता ही नहीं। 
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बैंगनी रंग के टी-शर्ट के साथ सस्ती डेनिम की जींस पैंट पहने कमलू को देखकर अनुमान लगाना कठिन है कि वह छत्तीसगढ़ के किसी आम युवकों से अलग है। लेकिन बातचीत शुरु करें तो पता चलता है कि वह बहुत अलग है। 

कुछ पूछिए तो पहले शर्माता है फिर मुस्कुराते हुए न्यूनतम शब्दों में जवाब देता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से महज सवा दो सौ किलोमीटर दूर रहने वाले कमलू ने अब तक रायपुर शहर को नहीं देखा है। बसों की यात्रा तो वह कर चुका है लेकिन उसने अब तक रेल की यात्रा नहीं की है। 

जिस समय हम डिजिटल इंडिया की बात कर रहे हैं और सोशल मीडिया क्रांति पर भरमा रहे हैं बस्तर में ऐसे हजारों युवा हैं जिन्होंने अब तक रेल की यात्रा नहीं की है। उनमें से कुछ मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं लेकिन वे इंटरनेट को नहीं जानते। 

दिल्ली से देश चलाने वाले नेताओं को हो सकता है कि अपनी लोकप्रियता पर बहुत भ्रम हो लेकिन कमलू उनकी कलई खोलता है। न वह नरेंद्र मोदी को जानता है न राहुल गांधी हो। राजनीतिक नेताओं में सिर्फ इंदिरा गांधी के नाम पर उसकी आंखें चमकती हैं और वह धीरे से सिर हिलाकर जताता है कि वह इस नाम से परिचित है। 

दिल्ली में बैठकर यह कल्पना कठिन लगती है कि कोई नरेंद्र मोदी को भला कैसे नहीं जानता होगा। मैं फिर पूछता हूं, "नरेंद्र मोदी को नहीं जानते?" वह इनकार में सिर हिलाता है। 

बताता है कि कोंडागांव से 30 किलोमीटर दूर उसका गांव है। वहां उसके मां-बाप रहते हैं। ढाबे से उसे चार हज़ार रूपए तनख्वाह मिलती है और वह सारे पैसे उन्हें भिजवा देता है। उसे खाना ढाबे पर ही मिलता है। ढाबे के पीछे बने एक कमरे में खाना खाते हुए वह अपनी थाली खिसकाकर दिखा देता है कि यह उसका प्रिय भोजन है। इसी कमरे में वह अपने दूसरे साथियों के साथ रहता है। 

उसका अपना खर्च ग्राहकों से मिलने वाले 'टिप' से चलता है। हमारे शहरी बच्चे तीन-चार बरस की उम्र में यह जवाब देना सीख जाते हैं कि 'बड़े होकर क्या बनोगे?' लेकिन कमलू 18 बरस होने के बाद भी नहीं जानता कि वह 

क्या करना चाहता है। धीरे से कहता है, "काम करना चाहता हूं।" बड़े स्पष्ट शब्दों में कहता है कि वह 'दादा लोगों' यानी नक्सलियों के साथ काम नहीं करना चाहता लेकिन पुलिस की नौकरी मिले तो? उसकी मुस्कान बताती है कि उसे अच्छा लगेगा। 

मेरा मन नहीं मानता और मैं फिर एक बार पूछता हूं, "नरेंद्र मोदी का नाम अब तक नहीं सुना?" इस बार वह थोड़ा ठहरकर कहता है, "सरकार है क्या?"  

दिल्ली में बैठी सरकार गर्व करती है कि भारत में युवाओं की आबादी सबसे ज्यादा है और 65 प्रतिशत युवा आबादी के साथ वह महाशक्ति होने के सपने बेचती है। लेकिन नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी शायद नहीं जानते कि कमलू जैसे भी लाखों होंगे जो इस युवा आबादी की गिनती में तो शामिल हैं लेकिन उनके सपनों के  खरीददार नहीं हैं। उनके लिए रोटी का गोल बन जाना ही सबसे बड़ा सपना है।
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