अयोध्या (फैजाबाद) के जिला प्रशासन ने 6 दिसंबर, 1992 को मुझे सूचित किया कि अयोध्या की स्थिति विस्फोटक हो गई है। जिलाधिकारी ने केंद्रीय सुरक्षा बलों की 4 बटालियनें मांगी हैं। उसी संदेश में यह भी उल्लेख था कि आम लोगों की भीड़ बहुत है।
सुरक्षा बलों की टुकड़ियां साकेत महाविद्यालय से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। गोली चलाने का आदेश मांगा गया था। मैंने दृढ़ता से आदेश दिया कि किसी भी स्थिति में गोली नहीं चलानी है। मुझे इस आदेश पर गर्व है। एक रामभक्त दूसरे रामभक्तों के रक्त से अपने हाथ रंग ही नहीं सकता।
फिर जो ढांचा ढहाया गया, वह मस्जिद नहीं, एक जर्जर ढांचा था। यह बात मैं नहीं, सीबीआई के अधिकारी कह रहे हैं । उन्होंने सीबीआई कोर्ट में अपने बयान में कहा है कि संबंधित स्थान पर 1936 से कोई नमाज पढ़ने नहीं गया। जब वहां इतने दिनों नमाज ही नहीं हुई तो फिर मस्जिद थी ही कहां।
लेखक कल्याण सिंह ढांचा ध्वंस के समय यूपी के मुख्यमंत्री थे। वे एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिन्होंने ढांचा ढहने पर माफी मांगने के बजाय न्यायालय से एक दिन की सजा कुबूल की।