एक हालिया किताब में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एएन रे को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। किताब में लिखा गया है कि 1973 में देश का सर्वोच्च न्यायिक पद स्वीकार करने के लिए जस्टिस रे को केवल दो घंटे का समय दिया गया था। बता दें कि उनकी नियुक्ति के कारण सर्वोच्च न्यायालय के तीन जजों की वरिष्ठता से समझौता किया गया था।
जस्टिस अजीत नाथ रे ने कहा कि यदि उस पद को मैं स्वीकार नहीं करता तो उसे किसी और को पेश किया जाता। मैं उसके लिए लालायित नहीं था। यह बात उन्होंने ‘सुप्रीम व्हिस्पर्स’ नामक किताब में कही है। इस किताब का लेखन पूर्व मुख्य न्यायाधीश वाईवी चंद्रचूड़ के पोते अभिनव चंद्रचूड़ ने किया है।
हालांकि दो घंटे में मुख्य न्यायाधीश का पद स्वीकार करने के जस्टिस रे के बयान को तत्कालीन समय के कुछ वरिष्ठ जजों ने चुनौती दी है। किताब में उन्होंने कहा कि जस्टिस रे की नियुक्ति के बारे में उन्हें बहुत पहले से पता था। बता दें कि साल 2010 में जस्टिस रे की मृत्यु हो गई थी।
इसके साथ सुप्रीम कोर्ट के 66 जजों के कई अन्य दावों और प्रतिदावों का किताब में जिक्र है। ये सभी दावे अमेरिकी शोधार्थी जॉर्ज एच गैडबोइस जूनियर के साथ 1980 के दशक में एक साक्षात्कार में किए गए थे।
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जस्टिस रे की नियुक्ति 25 अप्रैल, 1973 को की गई थी। इससे एक दिन पहले ही केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला दिया था। 13 जजों की संविधानिक पीठ को 7-6 से आया फैसला केंद्र और केरल सरकार के खिलाफ था।
इस फैसले से यह तय हो गया था कि संविधान का बुनियादी ढांचा नहीं बदला जा सकता है। इसी के बाद तीन वरिष्ठ जजों को दरकिनार करते हुए पहली बार किसी को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था।