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Jharkhand: भाजपा को झारखंड में मिल गया नया 'मांझी'! क्या पार लगेगी पार्टी की नाव?

डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला Published by: ज्योति भास्कर Updated Wed, 21 Aug 2024 07:50 PM IST

सार

झारखंड गठन के बाद प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में भारतीय जनता पार्टी (BJP) पहली ऐसी पार्टी रही, जिसने पूरे पांच साल सरकार चलाई। तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास की विदाई के बाद राज्य में एक बार फिर गठबंधन सरकार का दौर लौटा। ताजा घटनाक्रम में चंपई सोरेन का आहत होना चर्चा में है। सत्ताधारी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के आंतरिक टकराव के बीच अब सबकी नजरें भाजपा पर टिकी हैं।
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झारखंड के पूर्व सीएम चंपई सोरेन और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी। - फोटो : ANI/अमर उजाला


चूंकि, चंपई सोरेन की खुली बगावत हेमंत सोरेन से है, वे झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ नहीं जाएंगे। झारखंड में विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन के अंतर्गत हेमंत सोरेन बिहार मॉडल को अपनाते हुए कांग्रेस, राजद और वाम दल साथ मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं। ऐसे में चंपई सोरेन का स्वाभाविक साथी एनडीए ही हो सकता है। 


चंपई सोरेन एनडीए के घटक दल के रूप में चुनावी लड़ाई लड़ते हैं, यह बड़ी खबर नहीं है। ज्यादा बड़ी खबर यह है कि उन्होंने भाजपा क्यों ज्वाइन नहीं की? रांची पहुंचने से पहले चंपई सोरेन तीन दिनों तक दिल्ली में थे और राजनीतिक गलियारों में लगातार यह कयास लगाए जा रहे थे कि देर-सबेर वे भाजपा ज्वाइन कर सकते हैं। लेकिन लंबे इंतजार के बाद भी चंपई सोरेन ने भाजपा ज्वाइन नहीं की। बल्कि रांची पहुंचकर नई पार्टी बनाने का एलान कर उन्होंने अपने समर्थकों को भी चौंका दिया। 


दरअसल, झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा का पूरा दांव हेमंत सोरेन सरकार में हुए कथित भ्रष्टाचार पर है। वह इसे पुरजोर तरीके से उठा रही है। लेकिन जैसे ही चंपई सोरेन के भाजपा ज्वाइन करने की खबरें मीडिया में चलने लगी थीं, हेमंत सोरेन यह कहते हुए भाजपा पर हमलावर हो गए थे कि भाजपा दूसरी पार्टियों को तोड़ने का काम करती है। यदि हेमंत सोरेन यह कहकर सहानुभूति का लाभ पाने में सफल रहते कि भाजपा ने जानबूझकर उनका घर तोड़ा है, तो भाजपा को चंपई सोरेन से वह लाभ नहीं मिल सकता था जिसकी उम्मीद लगाई जा रही है। 


महाराष्ट्र में हो चुका है नुकसान

भाजपा इसी सहानुभूति की लहर का नुकसान महाराष्ट्र में उठा चुकी है, जहां एकनाथ शिंदे और अजित पवार को साथ लेने के बाद भी वह लोकसभा चुनाव में कोई बढ़त नहीं बना पाई। शरद पवार और उद्धव ठाकरे ने न केवल अपनी जमीनी पकड़ बरकरार रखी, बल्कि अपने सांसदों को जिताने में भी सफलता हासिल की। माना जाता है कि शरद पवार और उद्धव ठाकरे को मिली इस सफलता के पीछे सहानुभूति का फैक्टर ही सबसे अधिक जिम्मेदार रहा है। ऐसे में भाजपा झारखंड में भी 'महाराष्ट्र मॉडल' विकसित नहीं होने देना चाहती थी। माना जा रहा है कि यह देखते हुए ही एक सहमति के अंतर्गत चंपई सोरेन को बाहर रहकर हेमंत सोरेन का वोट काटने का काम सौंप दिया गया है। 


JMM का कितना नुकसान कर सकते हैं चंपई सोरेन

राजनीतिक विश्लेषक कुमार संजय ने अमर उजाला से कहा कि चंपई सोरेन झारखंड के सबसे बड़े आदिवासी समुदाय के प्रभावी नेता के तौर पर जाने जाते हैं। वे हेमंत सोरेन के पिता के साथी रहे हैं और आंदोलन के दिनों से ही उन्हें झारखंड के संघर्ष करने वाले नेता के तौर पर देखा जाता है। यही कारण है कि हेमंत सोरेन को भी इस बात का एहसास है कि चंपई सोरेन उनका बड़ा नुकसान कर सकते हैं। 


उन्होंने कहा कि बिहार की तरह झारखंड में भी भाजपा को नया 'जीतन राम मांझी' मिल गया है। आदिवासी मतदाताओं के बीच दो फाड़ कर वे भाजपा की जीत की राह आसान कर सकते हैं। चूंकि, पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा की आदिवासी मतदाताओं-अनुसूचित जाति के मतदाताओं पर भाजपा की पकड़ ढीली पड़ी थी, चंपई सोरेन जैसे नेता उसकी यह पकड़ मजबूत बनाने में मदद कर सकते हैं।  
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