आतंकियों ने 90 डिग्री एंगल वाली पहाड़ियों पर पॉजिशन लेकर सुरक्षा बलों पर हमला किया था। घने जंगल वह ट्रैप की रणनीति थी। उस हमले में आतंकियों की संख्या ज्यादा नहीं थी, बल्कि एक ही दहशतगर्द ने ट्रैप लगाया था। उसमें सेना के दो अधिकारी, जेकेपी का एक डीएसपी और दो जवान शहीद हो गए थे। अब डोडा का यह हमला भी उसी रणनीति के तहत हुआ है। मुखबिर की सूचना भी सही थी, लेकिन इसके बावजूद सुरक्षा बलों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। नब्बे डिग्री की पहाड़ी से आतंकियों ने सुरक्षा बलों को अपने ट्रैप में फंसा लिया।
जेकेपी के सूत्रों का कहना है, ऐसा नहीं है कि हमारे पास सही सूचना का अभाव है। मुखबिर से मिली सूचना की सच्चाई को कम से कम तीन सोर्स के जरिए चेक किया जाता है। चाहे कोकेरनाग के पहाड़ी जंगलों में हुआ हमला हो या डोडा अटैक, दोनों ही मामलों में इंटेलिजेंस नेटवर्क सटीक रहा है। सूचना मिली तो ही ऑपरेशन शुरू किया गया था। मुखबिर से मिली सूचना में कई बार आतंकियों की सही संख्या का पता नहीं लग पाता। यही इनपुट रहता है कि फलां जगह पर आतंकी छिपे हैं। इसी हिसाब से सुरक्षा बलों की टीम तैयार की जाती है। सारा खेल, लोकेशन का है। सुरक्षा बलों को पहाड़ पर चढ़ना पड़ता है, जबकि आतंकी पहले से ही वहां पर मौजूद रहते हैं।
सूत्रों के मुताबिक, ऐसी स्थिति में दहशतगर्दों का अपर हैंड रहता है। वे पहाड़ी से हैंड ग्रेनेड फेंकते हैं। लंबी दूरी तक साफ दिखाने वाली दूरबीन के जरिए स्नाइपर शॉट मारते हैं। उसके बाद स्वचालित राइफलों से हमला बोला जाता है। ऐसी स्थिति में दहशतगर्दों से निपट पाना आसान नहीं होता। उन्हें घने जंगलों में छिपने और नब्बे डिग्री वाली पहाड़ी लोकेशन का फायदा मिलता है। वे सैन्य दस्ते की सभी गतिविधियों पर नजर रखते हैं। दूसरी तरफ सुरक्षा बलों को उनकी गतिविधि नजर नहीं आती। नतीजा, वे कई बार सुरक्षा बलों को भारी नुकसान पहुंचा देते हैं। ऐसे में चूक होने जैसी कोई बात नहीं होती। ये केवल अवसर की बात है।
सूत्रों ने बताया, राष्ट्रीय राइफल्स और पुलिस के विशेष अभियान दल (एसओजी) के जवानों ने सोमवार की शाम को देसा वन क्षेत्र के धारी गेट उरारबागी में घेराबंदी और तलाशी अभियान शुरू किया था। वहां पर पहले से ही आतंकी छिपे बैठे थे। उन्होंने हमले के लिए एक खास प्वाइंट तैयार कर रखा था। उस प्वाइंट पर जैसे ही सुरक्षा बल पहुंचते हैं, आतंकी हमला कर देते हैं। डोडा के पहाड़ी इलाके घना जंगल भी है। इसका एक किनारा हिमालय की तरफ जाता है, तो दूसरा कठुआ और सियासी से मिलता है। डोडा क्षेत्र में पहाड़ों पर कई प्राकृतिक गुफाएं भी बताई जाती हैं। ऐसे में आतंकियों को कुछ मदद मिल जाती है।
केंद्रीय बल के एक अधिकारी के मुताबिक, ऐसे ऑपरेशन में सुरक्षा बलों को नुकसान हो रहा है। पहाड़ से आतंकियों द्वारा हैंड ग्रेनेड फेंकना और स्नाइपर अटैक, ये एक साथ होता है। सुरक्षा बलों में शीर्ष स्तर यह चर्चा हो रही है कि इस तरह के इनपुट मिलने पर चारों तरफ से घेरा डाला जाए। अभी तीन स्तर पर घेरा डाला जाता है, लेकिन नब्बे डिग्री की हाइट से जवानों को नीचे नहीं उतारा जाता। इसी बात का फायदा, आतंकी उठाते हैं। अब इस तरह की रणनीति बनाई जा सकती है, जिसमें पहाड़ी के टॉप पर एक दस्ता उतारा जाए। इसके जरिए पहाड़ी पर छिपे आतंकियों को चारों तरफ से घेरा जा सकता है।
डोडा हमले की जिम्मेदारी 'कश्मीर टाइगर' आतंकी संगठन ने ली है। सोशल मीडिया पर जारी अपने बयान में इस संगठन का कहना है, मुजाहिदीन और भारतीय सेना के बीच 20 मिनट तक फायरिंग हुई थी। सैन्य बलों को एंबुश में घेरा गया है। आतंकी संगठन ने इस हमले में दर्जनभर जवानों के मारे जाने की बात कही है। छह जवानों के घायल होने की बात कही गई है। हालांकि अभी तक सेना की तरफ से एक अधिकारी सहित पांच जवानों की शहादत होने का बयान आया है।