दुनिया में हो रही 90 फीसदी आतंकी गतिविधियों का जुड़ाव किसी न किसी तरह पाकिस्तान से रहा है। तालिबान से पाकिस्तान और चीन को आशा है कि उन्हें लूट के माल में से उनका हिस्सा जरूर मिलेगा। आईएसआई चीफ लेफ़्टिनेंट जनरल फैज हमीद की बैठक में ये सब बातें चर्चा का विषय रही हैं। पाकिस्तान में इस वक्त अफगानिस्तान के तीस लाख से ज्यादा शरणार्थी पहुंच चुके हैं। वह डूरंड लाइन को भी नहीं मानता है। पड़ोसी की सोच है कि इस बहाने उसे फंड मिल जाएगा। वह पैसा मांग रहा है। हक्कानी, जो आईएसआई से ही निकला है, उसे तालिबान के मंत्रिमंडल में अच्छी जगह मिल गई है। पाकिस्तान और तालिबान, अलग नहीं हैं। पूर्व आईपीएस आजाद कहते हैं, आपको ध्यान होगा कि 2001 में कुन्दूज एयरलिफ्ट का मामला दुनिया के सामने आया था। अमेरिका ने तालिबान पर जबरदस्त बमबारी कर दी थी। पाक के शीर्ष अधिकारी, तालिबान के बड़े लोगों को निकालकर लाए थे। पड़ोसी देश पाकिस्तान, शुरू से चाहता है कि ‘तालिबान’ को वैश्विक मान्यता मिल जाए।
रूस भी चिंता में है। उसकी मुस्लिम आबादी में तालिबान का कैसा असर होगा। दूसरा, तालिबान के साथ तो 35 आतंकी संगठन हैं। उनके बीच समन्वय कैसा होगा, ये कोई नहीं जानता। अमेरिका को तालिबान ने कहा, उसकी जमीं से अलकायदा की गतिविधियां नहीं होंगी। आईएस और आईएसकेपी जैसे आतंकी संगठन अलग राह पर हैं। इनके बीच समन्वय नहीं है। इन पर तालिबान का अंकुश बहुत मश्किल होगा। पहले आतंकी संगठनों का एक कॉमन गोल था कि अफगानिस्तान से बाहरी ताकतों को उखाड़ा जाए। अब उसने वह लक्ष्य हासिल कर लिया है। पाकिस्तान के साथ मिलकर हक्कानी, लश्कर और जैश, ये आतंकी संगठन कश्मीर में गड़बड़ी फैलाने का लक्ष्य बना रहे हैं। पाकिस्तान, अपने आतंकी ट्रेनिंग कैंपों को अफगानिस्तान में शिफ्ट करना चाहता है। अलकायदा, अमेरिका पर लक्ष्य साधेगा, इसमें शक नहीं है। इनकी गतिविधियां चालू हो रही हैं। तालिबान का अभी पहला अध्याय है। इसका अनुभव अच्छा नहीं रहा। दुनिया के देश तालिबान को मान्यता देने में हिचक रहे हैं। वजह, तालिबान का भविष्य पूरी तरह अनिश्चित है। पाकिस्तान, हर संभव प्रयास करेगा कि आतंकी समूहों को दोबारा से खड़े कर भारत, अमेरिका या किसी दूसरे पश्चिमी राष्ट्र पर निशाना लगा दे। अफगानिस्तान में अभी बहुत खराब स्थिति है। कुछ समय बाद स्थितियां तेजी से बदलेंगी। उनकी रफ्तार और दिशा, इसके लिए इंतजार करना होगा।