स्पेशल पुलिस कमिश्नर द्वारा पुलिस अधिकारियों को अदालत जाकर व्यक्तिगत रूप से पूछताछ में शामिल होने का आदेश दिए जाने के बाद दिल्ली के वकीलों ने अपनी हड़ताल वापस ले ली है। मंगलवार से दिल्ली की जिला अदालतों में सामान्य तरीके से कामकाज हो सकेगा। नए आदेश के बाद अब अपराध सहित तमाम कानूनी मामलों में पुलिस अधिकारियों को जिला अदालतों में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर अपनी बात रखनी पड़ेगी। जबकि इसके पहले उपराज्यपाल द्वारा जारी किए गए आदेश में पुलिस अधिकारियों समेत केस से जुड़े तमाम पक्षों (वादी-प्रतिवादी सहित) को संबंधित अथॉरिटी द्वारा निर्धारित स्थानों से गवाही या पूछताछ में शामिल होने की अनुमति दे दी गई थी। कानूनी प्रक्रिया में इसे सही न मानते हुए दिल्ली जिला अदालतों के वकीलों ने हड़ताल का ऐलान कर दिया था जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही थी।
वकीलों की हड़ताल समाप्त हो गई है, लेकिन स्पेशल पुलिस कमिश्नर के इस आदेश के बाद सवाल हो रहे हैं कि क्या स्पेशल पुलिस कमिश्नर ऐसा कोई आदेश जारी कर सकते हैं जो उपराज्यपाल द्वारा जारी निर्देशों से परस्पर विरोधी स्वभाव का हो? दिल्ली के वकीलों का विरोध मूल रूप से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की नई प्रणाली से उपजा है। ऐसे में क्या वकीलों का विरोध बीएनएसएस में किसी बड़े बदलाव का कारण बनेगा?
क्या है पूरा विवाद
दरअसल, देश में अदालतों में विचाराधीन मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अनुमान है कि देश की विभिन्न अदालतों में 3.5 करोड़ केस विचाराधीन हैं। पेंडिंग केसों के कारण एक तरफ जहां देर से न्याय मिलता है, वहीं देश का विकास भी प्रभावित होता है। इसी सोच को ध्यान में रखते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) में ऐसे कानूनी प्रावधान किए गए जिससे कानूनी प्रक्रिया में तेजी आए, लोगों को जल्द न्याय मिले और अदालतों के ऊपर से बोझ कम हो।
वीडियो कांफ्रेंसिंग (वीसी) के जरिए पूछताछ को अनुमति
त्वरित न्याय की इसी अवधारणा को ध्यान में रखते हुए बीएनएसएस में यह प्रावधान किया गया कि किसी विवाद के संदर्भ में पुलिस, वादी-प्रतिवादी, गवाह या केस से संबंधित अन्य पक्ष सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्धारित स्थान से वीडियो कांफ्रेंसिंग (वीसी) के जरिए पूछताछ में शामिल हो सकते हैं। यह स्थान थाना या जेल या अन्य कोई भी स्थान हो सकता है। कानून की मूल अवधारणा यह थी कि चूंकि, वादियों-प्रतिवादियों, पुलिस अधिकारियों या गवाहों के आने-जाने में बहुत समय नष्ट होता है, वीडियो कांफ्रेंसिंग से पेशी होने पर न्याय की प्रक्रिया में तेजी आएगी।
बीएनएसएस की इसी मूल भावना को ध्यान में रखते हुए पहले दिल्ली हाईकोर्ट और बाद में दिल्ली के उपराज्यपाल कार्यालय ने एक नोटिफिकेशन जारी कर गवाहों, वादी-प्रतिवादियों को अदालत में उपस्थित होने की बजाय निर्धारित स्थानों से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए पूछताछ में शामिल होने की अनुमति दे दी।
वकीलों ने किया विरोध
लेकिन उपराज्यपाल के आदेश के बाद दिल्ली के सभी जिला अदालतों के वकीलों ने इसे कानून की प्रक्रिया में बड़ी बाधा बताते हुए इसका विरोध कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील धीरज सिंह ने अमर उजाला से कहा कि किसी अधिकारी या वादी-प्रतिवादी से व्यक्तिगत पूछताछ की वीडियो कांफ्रेंसिंग (वीसी) के जरिए पूछताछ से तुलना नहीं की जा सकती। कई बार सुनवाई और पूछताछ के दौरान वादी-प्रतिवादी या गवाह के हाव-भाव न्यायाधीशों और वकीलों को यह समझने में सहायता करते हैं कि अमुक व्यक्ति सच बोल रहा है या नहीं। लेकिन यदि वीडियो कांफ्रेंसिंग से लोगों की पेशी होगी तो इससे जजों के साथ-साथ वकीलों को भी वादियों-प्रतिवादियों, पुलिस अधिकारियों या गवाहों को सही तरीके से समझने में परेशानी होगी। इससे न्याय प्रभावित होता है।
'बीएनएसएस में हो उचित बदलाव'
धीरज सिंह ने कहा कि महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उपराज्यपाल का यह आदेश बीएनएसएस के प्रावधानों को लागू करने की एक प्रक्रिया के स्वरूप में सामने आया है। इसलिए जब तक बीएनएसएस से ही वीडियो कांफ्रेंसिंग को पूछताछ का एक सामान्य तरीका बनाने की बात नहीं हटाई जाती, स्पेशल पुलिस कमिश्नर का आदेश समस्या का स्थाई समाधान नहीं देता। उन्होंने कहा कि भविष्य में वकीलों और प्रशासन में टकराव न हो, इसके लिए बीएनएसएस में उचित बदलाव किया जाना चाहिए।
'एलजी और स्पेशल पुलिस कमिश्नर के आदेश परस्पर विरोधी'
दिल्ली हाईकोर्ट के वकील दर्शन शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय और उपराज्यपाल का नोटिफिकेशन यह कहता है कि वादियों-प्रतिवादियों या गवाहों की पेशी कहीं से भी की जा सकती है। लेकिन स्पेशल पुलिस कमिश्नर के आदेश के अनुसार, पुलिस अधिकारियों को अब न्यायालय में प्रस्तुत होकर अपना पक्ष रखना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि, इससे साफ होता है कि दोनों नोटिफिकेशन अपने स्वरूप में एक दूसरे के विरोधी हैं। उन्होंने कहा कि कोई पुलिस अधिकारी ऐसा आदेश जारी नहीं कर सकता जो उच्च न्यायालय या अपने ही उच्च अधिकारी (दिल्ली पुलिस उपराज्यपाल के अधीन होने के संदर्भ में) के आदेशों के विपरीत हों।
'पुलिस का आदेश समस्या का समाधान नहीं करता'
दर्शन शर्मा ने कहा कि बड़ी बात यह है कि स्पेशल पुलिस कमिश्नर उच्च अधिकारी होने के कारण अपने विभाग से जुड़े अधिकारियों के संदर्भ में आदेश जारी कर सकते हैं। लेकिन उनका आदेश केस के दूसरे पक्षों पर लागू नहीं होता। यानी उपराज्यपाल के नोटिफिकेशन के कारण अभी भी वादियों, गवाहों या साक्ष्यों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के सामने पेश करने का रास्ता खुला हुआ है। उन्होंने कहा कि ऐसे में जब तक उपराज्यपाल अपना आदेश वापस नहीं लेते, इसका कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने कहा कि हालांकि, सभी वकीलों ने हड़ताल वापस लेने पर सहमति जता दी है। लेकिन मूल मुद्दों पर उनका विरोध जारी रहेगा।
क्या स्पेशल पुलिस कमिश्नर का आदेश उपराज्यपाल के आदेश का विरोधी है?
सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे ने अमर उजाला से कहा कि स्पेशल पुलिस कमिश्नर का आदेश पहली दृष्टि में उपराज्यपाल के आदेश के विरोधी स्वभाव का है। लेकिन इसको इस दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों और उच्च अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्र में बेहतर कार्य निर्वहन को सुनिश्चित करने के लिए विवेकाधिकार दिए गए हैं। सभी संबंधित अधिकारी इसके अनुसार, अपने-अपने क्षेत्र में निर्णय ले सकते हैं और आदेश जारी कर सकते हैं।
इस तरह उपराज्यपाल ने अपने क्षेत्र में त्वरित न्याय को सुनिश्चित करने के लिए आदेश जारी किए हैं, और स्पेशल पुलिस कमिश्नर ने अपने विभाग के अधिकारियों के लिए आदेश जारी किया है। लेकिन इस संदर्भ में, चूंकि उपराज्यपाल दिल्ली पुलिस के मुखिया हैं, वे यदि इस आदेश को उचित नहीं मानते हैं तो इसे खारिज करने या इसके स्थान पर जैसा उचित समझें, आदेश जारी कर सकते हैं।
वीडियो कांफ्रेंसिंग नई अवधारणा नहीं, लेकिन हर मामले में लागू न हो
अश्विनी कुमार दुबे ने कहा कि वीडियो कांफ्रेंसिंग के द्वारा किसी गवाह या अपराधी को अदालत के सामने पेश करना कोई नई अवधारणा नहीं है। डिजिटल युग के आने के साथ ही यह प्रक्रिया अपनाई जा रही है। कई बार अदालतें गवाह या अपराधी की जान की सुरक्षा या माहौल खराब होने की आशंका के कारण विशेष मामलों में कुछ लोगों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए पेशी की अनुमति देती रही हैं।
उन्होंने कहा कि, लेकिन व्यक्तिगत पेशी के द्वारा होने वाली पूछताछ और गवाही का महत्त्व देखते हुए वीडियो कांफ्रेंसिंग को एक सामान्य नियम नहीं बनाया जाना चाहिए और इसे सभी केसों में एक समान रूप से लागू नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा होता है तो इससे न्याय की प्रक्रिया और गुणवत्ता प्रभावित होगी।