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भारतीय मूल के इस लड़के का दिमाग आइंस्टीन से भी तेज

Sat, 01 Jul 2017 05:10 AM IST
एजेंसी/ लंदन 
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पूरी दुनिया में भारतीय अपने बौद्धिक कौशल का परचम लहरा रहे हैं। इसी कड़ी में एक 11 वर्षीय बालक का नाम भी जुड़ गया है। भारतीय मूल के अर्णव शर्मा ने दुनिया की प्रतिष्ठित मेन्सा आईक्यू परीक्षा में 162 का स्कोर हासिल कर शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। 
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अर्णव ने अल्बर्ट आइंस्टीन और स्टीफन हॉकिंस के आईक्यू स्तर से भी दो अधिक अंक हासिल किए हैं। उसे ब्रिटेन का सबसे बुद्धिमान बालक होने का गौरव हासिल हुआ है। यह परीक्षा वैश्विक स्तर पर प्रतिभाओं का आईक्यू स्तर बताती है।

मेन्सा आईक्यू टेस्ट को दुनिया का सबसे मुश्किल परीक्षण माना जाता है और दक्षिण इंग्लैंड स्थित रीडिंग टाउन के अर्णव शर्मा ने बिना किसी तैयारी के कुछ हफ्ते पहले ही इस परीक्षा को पास कर लिया। 
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अर्णव ने कहा कि - ‘मैं जानता हूं कि मेन्सा टेस्ट काफी कठिन होता है और कई लोग इसे पास नहीं कर पाते हैं। मुझे भी इस परीक्षा में अपने पास होने की उम्मीद नहीं थी, लेकिन मैंने फिर भी यह परीक्षा दी और इसमें मुझे करीब ढाई घंटे का वक्त लगा। परीक्षा देने के लिए वहां लगभग 7-8 लोग ही थे।’
 
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नाच-गाने का जुनून है अर्णव शर्मा को

अर्णव को ब्रिटेन में सबसे तेज बुद्धि वाला माना गया है। इससे पहले उन्होंने कभी यह टेस्ट नहीं दिया था। इस 11 साल के भारतीय बच्चे ने कहा कि उसने इस टेस्ट के लिए कोई तैयारी तक नहीं की थी लेकिन उसे इस टेस्ट को लेकर कोई घबराहट नहीं हुई। अर्णव ने कहा कि - जब मैंने उन्हें परिणाम के बारे में बताया तो वे बहुत खुश हुए।’ 

अर्णव की मां मीशा शर्मा ने कहा, ‘मैं सोच रही थी कि क्या चल रहा होगा क्योंकि उसने कभी देखा नहीं था कि यह पेपर कैसा होता है। लेकिन अर्णव जब वह ढाई साल का हुआ तो मुझे उसके मैथ्स के कौशल के बारे में पता चल गया था।’

अर्णव शर्मा को बचपन से ही नाच और गाने का जबरदस्त जुनून रहा है। जब वह आठ साल का था तो बॉलीवुड डांस करके वह रीडिंग्स गॉट टैलेंट के सेमीफाइनल तक भी पहुंच चुका है। उसे सिर्फ पश्चिमी गाने ही नहीं, बल्कि भारतीय फिल्मों के गानों का भी बड़ा शौक है। धूम धड़ाके वाले या शास्त्रीय गानों पर वह डांस करना भी पसंद करता है। 

दुनिया की सबसे बड़ी आईक्यू सोसायटी है मेन्सा

मेन्सा टेस्ट को दुनिया की सबसे बड़ी और पुरानी उच्च आईक्यू सोसायटी माना जाता है। इसकी स्थापना ऑक्सफोर्ड में वर्ष 1946 में हुई थी। वैज्ञानिक एवं वकील लांसलॉट लियोनेल वेयर और ऑस्ट्रेलियाई बैरिस्टर रोलैंड बेरिल को इस संस्था की स्थापना का श्रेय जाता है। धीरे-धीरे इस संस्था का पूरी दुनिया में प्रभाव बढ़ता गया।
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