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Defence: सेना का सामान ढोएंगे रोबो खच्चर, -40 डिग्री में भी गर्म रहेंगे ये टेंट, ड्रोन अटैक को फेल करेगी ये गन

सार

हिमटेक सिंपोजियम में लोगों में आकर्षण का केंद्र बने रोबोटिक म्यूल यानी रोबोटिक खच्चर को किसी भी मौसम में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह न केवल वजन ढो सकता है, बल्कि जरूरत पड़ने पर दुश्मन पर गोलियों की बौछार भी कर सकता है। 
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माइस 40 डिग्री में भी सैनिकों को गर्म रखेगा ये खास टेंट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भारतीय सेना ने फॉरवर्ड एरिया में तैनाती के लिए 100 रोबोटिक म्यूल्स खरीदे हैं। सेना ने यह खरीद इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत की है। इसके अलावा सेना सियाचिन जैसे हाई एल्टीट्यूड एरिया में तैनात जवानों के लिए -40 डिग्री तापमान को भी सहने वाले नए टेंटों को खरीदने की भी योजना बना रही है। इन टेंटों का हाई एल्टीट्यूड इलाकों में ट्रायल भी चल रहा है और अभी तक ये उम्मीदों पर खरे उतरे हैं। इसके अलावा जिस तरह से ड्रोन टक्नोलॉजी का इस्तेमाल बढ़ रहा है और ड्रोन के जरिए हथियारों और ड्रग्स की तस्करी को अंजाम दिया रहा है, ऐसे में सेना एंटी-ड्रोन सिस्टम की भी तलाश कर रही है, ताकि दुश्मन की तरफ से छोड़े जाने वाले ड्रोनों को जाम किया जा सके। सेना की एक यूनिट को ये गन सप्लाई भी की गई हैं। भारतीय सेना हाई एल्टीट्यूड इलाकों में इस्तेमाल के लिए जिन प्रोडक्ट्स में रूचि दिखा रही है, ये सभी प्रोडक्ट्स पिछले सप्ताह लेह में आयोजित हिमटेक सिंपोजियम में प्रदर्शित किए गए। 
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रोबोटिक खच्चर है बड़े काम का 
हिमटेक सिंपोजियम में लोगों में आकर्षण का केंद्र बने रोबोटिक म्यूल यानी रोबोटिक खच्चर को किसी भी मौसम में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह न केवल वजन ढो सकता है, बल्कि जरूरत पड़ने पर दुश्मन पर गोलियों की बौछार भी कर सकता है। भारतीय सेना ने आपातकालीन खरीद (ईपी) के चौथे चरण (सितंबर 2022 से सितंबर 2023) के तहत 100 रोबोटिक खच्चर खरीदे हैं और उनकी फॉरवर्ड एरिया में तैनाती की योजना है। पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ 2020 के गतिरोध के बाद से, सेना कई तरह के कार्यों के लिए विशेष रूप से हाई एल्टीट्यूड इलाकों के लिए टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट्स की तलाश कर रही है। रोबोटिक म्यूल को बनाने वाले कंपनी एयरोआर्क के प्रबंध निदेशक और सीईओ अर्जुन अग्रवाल ने अमर उजाला को बताया कि उनका बनाया रोबोटिक म्यूल सभी प्रकार की बाधाओं और रुकावटों को पार कर सकता है। वह पानी के अंदर जा सकता है और नदी-नालों को भी पार कर सकता है। उसके पास इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स, इंफ्रारेड जैसी चीज़ों को पहचानने की क्षमता है। यह न कवेल सीढ़ियां, खड़ी पहाड़ियों और अन्य बाधाएं आसानी से पार कर सकता है, बल्कि -40 से +55 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी काम कर सकता है। साथ ही, यह 15 किलोग्राम का वजन भी ढो सकता है। 

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-40 डिग्री तापमान में 15 डिग्री का तापमान देते हैं 'पीक पॉड्स' 
वहीं भारतीय सेना लद्दाख के हाई एल्टीट्यूड इलाकों जैसे सियाचिन में भी तैनात है, जिसे दुनिया का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र भी कहा जाता है। सर्दियों में यहां तापमान -50 डिग्री सेल्सियक तक भी पहुंच जाता है। भारतीय सेना को इन इलाकों में तैनात अपने जवानों के लिए टेंट तलाश कर रही है। हिमटेक में, डीटेक 360 इनोवेशन ने हाई एल्टीट्यूड इलाकों में तैनात जवानों के लिए खास टेंट तैयार किए हैं, जिन्हें 'पीक पॉड्स' कहा जाता है। इन्हें शून्य से भी नीचे के तापमान वाले इलाकों के लिए क्षेत्रों के लिए डिजाइन किया गया है। 

डीटेक 360 इनोवेशन के मैनेजिंग डायरेक्टर विनय मित्तल ने अमर उजाला को बताया कि ‘पीक पॉड्स’ दुनिया में अपनी तरह का पहला ऐसा प्रोडक्ट है, जिसे इस तरह से डिजाइन किया गया है, ताकि हमारे सुरक्षाबल हाई एल्टीट्यूड इलाकों में भी लंबे समय तक काम कर सकें। उनके बनाए पीक पॉड्स की खासियत है कि बाहर अगर -40 डिग्री का भी तापमान है, तो अंदर 15 डिग्री का तापमान मिलेगा। वह भी किसी बिजली या ईंधन के इस्तेमाल किए बगैर। उन्होंने बताया कि पीक पॉड्स में इनबिल्ट बायो-टॉयलेट की भी सुविधा है, जो दुनिया के किसी भी प्रोडक्ट में उपलब्ध नहीं है। इन बायो-टॉयलेट में मानव उत्सर्जन को फिर से इस्तेमाल किये जाने वाले पानी में परिवर्तित करने की टेक्नोलॉजी लगी है। 

मित्तल के मुताबिक उनके प्रोडक्ट्स का लेह (11,500 फीट), दौलत बेग ओल्डी (16,700 फीट) और दुरबुक (12,500 फीट) पर भी ट्रायल किया जा चुका है। लेह में ट्रायल दिसंबर 2022 से मार्च 2023 तक और दुरबुक में दिसंबर 2023 से फरवरी 2024 तक आयोजित किए गए थे। जबकि डीबीओ में मई 2023 में शुरू हुए परीक्षण अभी भी जारी हैं। हिमटेक में आए सेना के वरिष्ठ अफसरों ने भी पीक पॉड्स के रिजल्ट्स की काफी तारीफें कीं और कहा कि ये उनकी उम्मीदों पर खरे उतरे हैं। मित्तल ने बताया कि पीक पॉड को तेजी से कहीं भी तैनात किया जा सकता है। इसे 30 किलोग्राम के ब्लॉकों में तोड़ा जा सकता है और यह उच्च ऊंचाई वाले सैन्य ठिकानों, अंटार्कटिका जैसे रिसर्च स्टेशनों, फास्ट-ट्रैक अस्पतालों और बतौर आपदा राहत शिविर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। 

भारतीय सेना को मिली स्वदेशी एंटी ड्रोन गन
वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध में जिस तरह से ड्रोन का इस्तेमाल हमलों के लिए हो रहा है, उससे भारतीय सेना भी चिंतित है। पहले ही पाकिस्तान से सटे पंजाब के बॉर्डर इलाकों में जिस तरह से ड्रोन के जरिए हथियार और नशे की खेप की तस्करी की जा रही है, वह वाकई चिंताजनक है। ड्रोन के बढ़ते खतरों को देखते हुए भारतीय सेना की इंफ्रेंट्री यूनिट को स्वदेशी एंटी-ड्रोन गन भी मिली हैं। सेना की एक यूनिट को करीब चार महीने पहले ये गन सप्लाई भी की गई हैं। इस ऑर्डर की लागत 200 करोड़ रुपये है। इसे स्वदेशी स्टार्टअप बिग बैंग बूम सॉल्यूशंस ने बनाया है। एंटी-ड्रोन सिस्टम के लिए सेना और एयरफोर्स से कॉन्ट्रैक्ट साइन हुआ है और इसकी डिलीवरी नवंबर में शुरू हो जाएगी।

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एंटी ड्रोन गन: कैसे करती है काम
बिंग बैंग बूम सॉल्यूशंस के वाइस प्रेजिडेंट गौरव शर्मा ने अमर उजाला को बताया कि एंटी-ड्रोन गन और डिटेक्टर दोनों साथ मिल कर कम करते हैं। डिटेक्टर 360 डिग्री में चार किलोमीटर के दायरे में आने वाले किसी भी ड्रोन की पहचान कर सकता है। इसके साथ एक टैबलेट कनेक्ट होता है, अगर जैसे ही कोई ड्रोन इसके दायरे में आएगा, तो इसमें अलार्म बजेगा। उन्होंने बताया कि इस डिटेक्टर का पता किसी को नही चलेगा। डिटेक्टर से ड्रोन की दिशा का पता चलते ही उस दिशा में गन जैसे दिखने वाले एंटी ड्रोन गन को चलाना होता है, जिससे 45 डिग्री की एक अदृश्य बीम निकलती है, जो एक जाल की तरह ड्रोन को घेर लेती है और ड्रोन का कंट्रोल खत्म हो जाता है और वह जाम हो जाता है। इसमें कई तरह की फ्रिक्वेंसी दी गई हैं। इस गन को मोबाइल की तरह ही चार्ज किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि यह स्वार्म ड्रोनों को भी मार गिरा सकती है, इसके लिए यह मदर स्वार्म ड्रोन पर टारगेट करती है, जिससे बाकी ड्रोन को भी सिग्नल नहीं मिलता और धीरे-धीरे उनकी बैटरी डाउन हो जाती है और वे नीचे गिर जाते हैं। उन्होंने बताया कि यह एंटी ड्रोन सिस्टम इस तरह से तैयार किया गया है कि पैदल सैनिक भी 15 हजार से लेकर 18 हजार फीट पर बनीं पोस्टों तक इसे आसानी से उठा कर ले जा सकते हैं। 

गौरव के मुताबिक रक्षा मंत्रालय iDEX प्रोग्राम के तहत स्टार्टअप को प्रोटोटाइप बनाने के लिए फंड देता है, ताकि आर्मी, नेवी और एयरफोर्स की जरूरतें स्वदेशी कंपनियां पूरी कर सकें। सेनाओं की जरूरतों के मुताबिक अगर स्टार्टअप ने कोई नई टेक्नोलॉजी बनाई है, तो प्रोटोटाइप के लिए मंत्रालय मदद करता है और फिर उस प्रॉडक्ट को सेनाओं के लिए खरीदा जाता है। 


 
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