लद्दाख की गलवां घाटी में सोमवार को चीनी सेना ने पीछे हटना शुरू कर दिया। हालांकि, यह इतना आसान नहीं था, जितना दिखाई पड़ रहा है। भारत ने इसके लिए कई कूटनीतिक चालें चलीं, जिसके आगे 'ड्रैगन' को विवश होकर झुकना पड़ा।
जिस दौरान भारत और चीन के बीच सीमा विवाद शुरू हुआ, उस दौरान दुनियाभर के कई देशों से सरकार ने संपर्क साधे और उनसे समर्थन की अपील की। इस तरह सरकार को सीमा विवाद सुलझाने के लिए अपना पक्ष रखने में मदद मिली।
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और जापान के अपने समकक्षों से बात की और सरकार का पक्ष रखा। फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-यवेस ले ड्रियान के साथ बातचीत के बाद जयशंकर ने ट्वीट किया, 'फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-यवेस ले ड्रियान के साथ व्यापक चर्चा हुई। इस चर्चा में, समकालीन सुरक्षा और राजनीतिक महत्व के मुद्दों को कवर किया गया। स्वास्थ्य और विमानन क्षेत्र में कोविड से उत्पन्न हुई चुनौतियों के समाधान पर भी सहमति बनी।'
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जयशंकर ने भारत के सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य बनने और लद्दाख एवं सिक्किम में चीनी आक्रामकता को लेकर लिथुआनिया, एस्टोनिया, लताविया, मैक्सिको और आयरलैंड के मंत्रियों से बातचीत की और उन्हें स्थिति के बारे में बताया।
राजनयिक सूत्रों ने बताया कि भारत-चीन टकराव, इसके कारण और इससे निपटने के लिए भारत की योजना के बारे में दुनियाभर के देशों में गहन जिज्ञासा थी। कोविड-19 और चीनी आक्रामकता को लेकर भारत के बयानों पर दुनियाभर की नजरें टिकी हुईं थीं। सरकारी सूत्रों ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लद्दाख यात्रा ने चीनी आक्रामकता के साथ खड़े होने के भारतीय संकल्प को बढ़ाया।
इस दौरे से चीन और दुनिया को संदेश भेजने में आसानी हुई। जब यह हो रहा था, तो उस दौरान भारत और चीन लद्दाख में एलएसी पर तनाव कम करने के लिए सैन्य और राजनयिक स्तर पर गंभीर चर्चा में लगे हुए थे। एक अन्य सरकारी सूत्र ने बताया, हमने बेहद शांतिपूर्ण तरीके और प्रभावी रूप से अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को अपना पक्ष समझाया। परिणामस्वरूप, हमें सहानुभूति और समर्थन दोनों मिला।