लद्दाख में भारत और चीन सीमा पर दोनो देशों के सैनिकों के पीछे हटने के मुद्दे पर गतिरोध बरकरार है। रक्षा और विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की मानें तो सीमा की सुरक्षा के लिए लद्दाख में स्थायी तौर पर बड़ी सैन्य तैनाती रखनी पड़ सकती है। समाधान के बारे में पूछने पर दोनों मंत्रालयों के अधिकारी जवाब देते हैं कि यह तो चीन पर निर्भर करेगा। हालांकि हर दिन की सैन्य तैनाती पर करीब 100 करोड़ रुपये का खर्च आ रहा है। सैन्य कूटनीति के एक जानकार का कहना है कि देश की संप्रभुता की रक्षा करनी है तो अब इसे सहन करना ही पड़ेगा।
आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में विदेश मंत्री जयशंकर ने भारत और चीन के बीच चल रहे तनाव पर अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि भारतीय सैन्य कमांडरों ने पिछले एक साल के दौरान अपने चीनी समकक्षों के साथ नौ दौर की वार्ता की और ये भविष्य में भी जारी रहेगी। हालांकि जयशंकर ने कहा कि वार्ता में बनी सहमति पर चीन की तरफ से जमीनी स्तर पर कोई अमल नहीं हुआ। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने भी वार्ता में बनी सहमति के आधार पर एक से अधिक बार भारत और चीन की फौज के पीछे हटने की संभावना जताई, लेकिन हर बार स्थिति 'ढाक के तीन पात' रही।
सैन्य मामलों के जानकार मेजर जनरल (रिटा.) अशोक मेहता के अनुसार लद्दाख क्षेत्र में करीब 50 हजार अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती हुई है। मेहता का कहना है कि लद्दाख क्षेत्र में सैन्य तैनाती कोई आसान काम नहीं है। वहां बहुत ठंड पड़ती है। शून्य से 40 डिग्री नीचे तक तापमान गिर जाता है और इतनी बड़ी सैन्य तैनाती के लिए भारत को सैन्य साजो-सामान पर काफी अधिक खर्च करना पड़ रहा है। मेहता के अनुसार देश की सीमाओं की रक्षा के लिए यह जरूरी है और जब तक चीन की फौज पीछे नहीं हटती, हमें भी उसे माकूल जवाब देने के लिए तैयार रहना होगा।