कोरोना के इस दौर से पहले शायद दुनियाभर की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कभी इतना चुनौतीपूर्ण समय नहीं आया। कोरोना ने महाशक्ति माने जाने वाले अमेरिका समेत कई देशों की स्वास्थ्य सुविधाओं की कलई खोल दी। ऐसे में देश की स्वास्थ्य सुविधाओं की तरफ हमारा ध्यान जाना बहुत स्वाभाविक है।
कोरोना ने सिखाया आत्मनिर्भर बनना ही पड़ेगा
सबसे पहली बात कोरोना महामारी के दौर की ही करते हैं। कोरोना ने हमें स्वास्थ्य सुविधाओं को प्राथमिकता देने और आत्मनिर्भर बनने की सबसे बड़ी सीख दी। महामारी के शुरू होने पर पहले सरकार भारी असमंजस में थी। विशेषज्ञों-डॉक्टरों को अंदाजा नहीं था कि इसका मुकाबला कैसे किया जाया। कोरोना से बचाव का सबसे कारगार तरीका यही था कि देश के लोगों को इस वायरस से बचाने के लिए टीके लगाए जाएं। अमेरिका, रूस और चीन समेत कई देशों ने अपने-अपने यहां वैक्सीन बनाने का काम शुरू कर दिया। भारत भी इस मामले में पीछे नहीं रहा।
देश ने स्वास्थ्य सुविधाओं के बुनियादी ढांचे में सुधार करने के साथ-साथ वैक्सीन बनाने पर भी पूरी ताकत लगा दी। अब देश टीके के मामले में आत्मनिर्भर है। देश में कोवाक्सीन बन रही है। कोविशील्ड भले ही विदेशी है, लेकिन इसका उत्पादन भी भारत में ही हो रहा है। दोनों वैक्सीन दुनिया की सबसे सस्ती और विश्वसनीय मानी जा रही है। वैक्सीन के आने से लाखों लोगों को संक्रमण से बचाने में मदद मिली है। देश में अब तक 51 करोड़ से ज्यादा लोगों को कोरोना का टीका लगाया जा चुका है। आज देश में विश्व का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चल रहा है।
आजादी के बाद स्वास्थ्य सेवाओं में कितनी प्रगति हुई?
स्वतंत्रता के समय देश स्वास्थ्य सेवा के मामले में काफी पिछड़ा हुआ था। धीरे-धीरे आर्थिक योजनाओं के लागू होने से भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में बहुत प्रगति होने लगी। इसमें सबसे अहम था शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के रूप में बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया जाए। डॉक्टर, हॉस्पिटल की संख्या बढ़ाने से लेकर संचारी रोगों के नियंत्रण पाने की कोशिश हुई। एक नजर आंकड़ों पर भी डालते हैं...
- 1947 में जहां औसत उम्र महज 32 वर्ष थी, वह 2018 में 69.09 वर्ष हो गई।
- 1950-51 के दौरान देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 28 थी, जो अब 460 से ज्यादा हो गई है।
- आजादी के समय देश में सरकारी अस्पतालों की संख्या महज सात हजार थी। अब यह संख्या 26 हजार है।
- तब निजी अस्पतालों की संख्या केवल आठ फीसदी थी। आज यह संख्या 93 फीसदी है।
- आजादी के समय देश में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों की संख्या केवल 725 थी। अब डेढ़ लाख से ज्यादा स्वास्थ्य केंद्र हैं। कोरोना संकट में इन स्वास्थ्य केंद्रों की भूमिका ने गांवों की बहुत बड़ी मदद की है।
- आजादी के बाद 50 हजार डॉक्टर थे। 31 मार्च 2019 तक देश में 9.27 लाख पंजीकृत डॉक्टर सक्रिय सेवा में थे।
- आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथिक डॉक्टर की संख्या 7.88 लाख है। राज्यसभा में पेश स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में 11.59 लाख एलोपैथी डॉक्टर पंजीकृत हैं।