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US-China: अमेरिका के साथ आगे बढ़ना है तो भारत को चीन से थोड़ी झिझक छोड़नी पड़ेगी

सार

अमेरिका और चीन के बीच जारी टैरिफ युद्ध भारत के लिए एक अच्छा मौका साबित हो सकता है। अगर भारत अमेरिका के साथ आगे बढ़ना चाहता है तो उसे चीन को लेकर हिचक छोड़नी होगी। आइए समझे हैं भारत के पास क्या हैं विकल्प।
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चीन और भारत के झंडे - फोटो : Freepik
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विस्तार
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भारत को अमेरिका के साथ आगे बढ़ना है तो हिचक छोड़नी होगी। अमेरिकी उत्पाद पर कर घटाना होगा। चीन की परवाह थोड़ी कम करनी होगी। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि ऐसा सुनहरा अवसर बमुश्किल आता है। शशांक कहते हैं कि इसके बाबत उन्होंने प्रो. सचिन चतुर्वेदी को लिखा भी है। पूर्व विदेश सचिव का कहना है कि अमेरिका के 90 दिन टैरिफ वाली सीमा बीतने के बाद भी कोई दिक्कत नहीं आएगी।
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प्रो. सचिन चतुर्वेदी रिसर्च एंड इंफार्मेशन सिस्टम थिंक टैंक के महानिदेशक हैं। प्रो. चतुर्वेदी विकास और अर्थशास्त्र से जुड़े मुद्दे पर काफी गहराई से काम कर रहे हैं। शशांक कहते हैं कि जब वह विदेश सचिव थे, तभी प्रस्ताव दिया था कि भारत को अमेरिका के उत्पाद पर करों में कटौती करनी चाहिए। लेकिन वित्त मंत्रालय ने इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया। इसका एक कारण हमारे औद्योगिक घराने और सरकार का उनके हितों की सोचना भी रहा होगा।शशांक कहते हैं कि करो में कटौती करके और गैस में अमेरिकी हिस्सादारी आदि बनाए रखकर अनुकूल लक्ष्य साधा जा सकता है।

चीन से संबंध तक ठीक, लेकिन जरूरत से अधिक उसकी चिंता क्यों?
शशांक कहते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिका का मूड देखकर भी टैरिफ वार पर अड़े हैं। हर अमेरिकी चाहता है कि चीन दुनिया का नंबर-1 देश न बनने पाए। इसलिए ट्रंप काफी अध्ययन और होमवर्क के साथ आगे बढ़ रहे हैं। रहा सवाल भारत का तो हम जरूरत से ज्यादा चौकन्ना रहते हैं। हमें इसकी चिंता अधिक सताती है कि यह करेंगे तो वह हो जाएगा। चीन के मामले में भी ऐसा रहता है। कोई कह देगा कि चीन बांग्लादेश में बेस बना लेगा। कोई कुछ। एक बात तो तय है कि आगे बढ़ना है तो हमें थोड़ी झिझक छोड़नी होगी। शशांक का कहना है कि अमेरिका और चीन के बीच छिड़े ट्रेड वॉर में भी ऐसा दिखाई दे रहा है। शशांक कहते हैं कि अमेरिका की खुफिया निदेशक तुलसी गब्बार्ड का कहना है कि भारत के साथ टैरिफ का मुद्दा राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी सुलझा लेंगे। दरअसल अमेरिका यहां देखना चाहता है कि भारत उसके साथ कितना कदम चलने के लिए तैयार है। क्योंकि एक बात के बार-बार संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका और रूस में परस्पर समझदारी का एक रिश्ता बन रहा है।
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हमारे लिए म्यांमार और ईरान के चाबहार तक की पहुंच जरूरी है
विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि चीन एशिया का बड़ा खिलाड़ी है। अभी उसने अमेरिका के सामने टैरिफ वार में हथियार नहीं डाले हैं। रेयर अर्थ और बोइंग के कल पुर्जे को लेकर उसकी घोषणा का कुछ माने है। दूसरे यह ध्यान रखना होगा कि वह भारत का अब सक्षम पड़ोसी देश है। पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि रूस और भारत के रिश्ते अच्छे दौर में चल रहे हैं। रूस ने ईरान के साथ समझ बनाकर रखी है। यूरोप रूस से दूर हो रहे हैं। इस केमिस्ट्री को समझकर ही तो आगे बढ़ सकते हैं। पूर्व आईएफएस अफसर एसके शर्मा कहते हैं कि आप म्यांमार और ईरान तो गेट-वे के तौर पर चाहिए। इस मामले में शशांक का कहना है कि अमेरिका परमाणु हथियार कार्यक्रम मुक्त ईरान चाहता है। भारत इसमें रूस के साथ बड़ी भूमिका निभा सकता है। म्यांमार से रिश्ते हमें मध्य एशिया तक जाने और कारोबार का रास्ता देंगे। इसलिए यह रास्ता बिना चीन की बहुत परवाह किए बन सकता है।

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हमारे लिए गोल्डन चांस इसलिए है क्योंकि 
अमेरिका और चीन में कारोबारी टकराव है। रूस के साथ अमेरिका की सहयोगात्मक समझ बढ़ी है।, पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के की नीति को ट्रंप उलट रहे हैं। भारत और अमेरिका की इस्तामिक आतंकवाद के विरुद्ध सोच में काफी समानता है। दूसरे अमेरिका अब सीधे भारत के पास आ रहा है। इसमें कहीं भी यूरोप नहीं है। यूरोप अपनी तकनीक और साझेदारी को लेकर सीधा भारत के साथ संपर्क कर रहा है। यूरोप के पास विनिर्माण क्षेत्र की बड़ी इकाईयां नहीं हैं। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामनेई भारत के रिश्ते को मधुर रखना चाहते हैं और इस्राइल सन 2000 से हमसे एक अलग वेवलेंथ का रिश्ता रखकर चल रहा है। दापान के साथ भारत के पहले से तमाम कारोबारी संबंध चल रहे हैं। यहां तक कि चीन को अपना सामान बेचना है। कारोबारी रिश्ते के लिए भारत उसके लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए राष्ट्रीय हित साधा जा सकता है।
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