देश के नक्सल प्रभावित एवं आतंक ग्रस्त इलाकों में इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस यानी ‘आईईडी’ ब्लास्ट एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। मौजूदा दौर में जब राष्ट्रविरोधी ताकतों पर शिकंजा कसने लगा है, तो आतंकियों व नक्सलियों के सामने नई भर्ती का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में ये तत्व सुरक्षा बलों के सामने आने से बचने लगे हैं। आतंकी और नक्सली, अब छिपकर सुरक्षा बलों को भारी नुकसान पहुंचाने की रणनीति बना रहे हैं। इसके लिए वे आईईडी ब्लास्ट की मदद लेते हैं। पहले इस तरह के ब्लास्ट को तैयार करने एवं उसे लगाने की ट्रेनिंग लेने के लिए आतंकियों को अफगानिस्तान जाना पड़ता था। कुछ आतंकी समूह अपने गुर्गों को पाकिस्तान भेजते थे। इस बीच नक्सलियों ने भी आईईडी ब्लास्ट की तकनीक हासिल कर ली। खास बात ये है कि नक्सली अब आईईडी ब्लास्ट तैयार करने में आतंकियों से काफी आगे निकल चुके हैं। यहां तक कि नक्सल प्रभावित इलाकों में महिलाओं और बच्चों को भी इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
नक्सल प्रभावित इलाकों में सीआरपीएफ एवं दूसरे सुरक्षा बलों ने हजारों आईईडी बरामद की हैं। झारखंड का बूढ़ा पहाड़ इलाका अब सुरक्षा बलों के कब्जे में है। ऑपरेशन ऑक्टोपस ने यहां नक्सलियों की कमर तोड़ दी। इससे पहले लातेहार-लोहरदगा सीमा पर बुलबुल जंगल में ऑपरेशन डबल-बुल को अंजाम दिया गया। 18 दिन चले ऑपरेशन में 14 एनकाउंटर हुए थे। मुठभेड़ वाले इलाके से 16 आईईडी बरामद हुईं। 196 डेटोनेटर एवं 28 घातक हथियारों से लैस 14 हार्डकोर नक्सली धरे गए। ऑपरेशन आक्टोपस में चाइनीज ग्रेनेड सहित सौ से अधिक आईईडी बरामद की गईं। गया और औरंगाबाद में स्थित घने जंगलों में कोबरा दस्ते ने नक्सलियों के कब्जे से 500 डेटोनेटर, एक हजार आईईडी, प्रेशर बम, केन आईईडी बरामद की थी। नक्सल प्रभावित दूसरे इलाकों में भी आईईडी बरामद होती रही हैं।
राजस्थान के निम्बाहेड़ा में बरामद विस्फोटक केस में एनआईए द्वारा 22 सितंबर को पेश की गई चार्जशीट में दावा किया गया है कि आरोपी खुद ही आईईडी तैयार कर रहे थे। जांच में सामने आया कि सूफा आतंकी गैंग के मुख्य साजिशकर्ता इमरान खान और उसके सहयोगी आईएसआईएस से प्रेरित थे। इमरान खान अपने फार्म हाउस पर आईईडी तैयार करने की ट्रेनिंग देता था। इसके लिए स्थानीय दुकानों से सामग्री खरीदी जाती थी। इससे पहले भी कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें आरोपी आसपास के क्षेत्र से ही केमिकल खरीदकर उसकी मदद से विस्फोटक सामग्री तैयार करते थे। अब नक्सली इलाकों में सुरक्षा बलों के खिलाफ आईईडी का इस्तेमाल आम बात हो गई है। इसे दो तरीके से इस्तेमाल किया जाता है। एक, वाहन उड़ाने के मकसद से और दूसरा, जंगल में आगे बढ़ रहे सुरक्षा बलों को हमले की चपेट में लाने के लिए रास्ते पर आईईडी दबा दी जाती है। आईईडी बनाने और उसे लगाने की ट्रेनिंग का तरीका वैसा ही है, जैसा अफगानिस्तान के आतंकियों के समूहों में देखने को मिलता है। जम्मू-कश्मीर में सक्रिय कई आतंकी संगठनों के सदस्य भी अफगानिस्तान से आईईडी तैयार करने का प्रशिक्षण लेकर आए थे।