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Manipur: हिंसा के जख्म से घायल होता रहा है मणिपुर, जानें राज्य में कब-कब हुए संघर्ष और नतीजा क्या रहा?

Wed, 31 May 2023 06:18 AM IST
शिवेंद्र तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

50 के दशक के अंत से विद्रोही समूहों की लड़ाई ने राज्य को अशांत करना शुरू कर दिया। इस दौरान नगा राष्ट्रीय आंदोलन और एक स्वतंत्र नगालिम क्षेत्र के लिए लड़ाई से मणिपुर के कई हिस्सों हिंसा की चपेट में आ गए। 
 
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मणिपुर हिंसा - फोटो : AMAR UJALA
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विस्तार
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मणिपुर में जारी हिंसा के बीच गृहमंत्री अमित शाह सोमवार रात राजधानी इंफाल पहुंचे। शाह ने मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह, मंत्रियों, वरिष्ठ नेताओं और अधिकारियों के साथ बैठक की। राज्य में शांति हो इसके लिए खुद गृहमंत्री सामाजिक संगठनों से मुलाकात कर रहे हैं। शाह ने मणिपुर के इंफाल में विभिन्न नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधिमंडलों के साथ मुलाकात की। 
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मणिपुर में संघर्ष की घटनाएं नई नहीं हैं। राज्य में इस तरह की घटनाओं का एक लंबा इतिहास रहा है। आइए जानते हैं मणिपुर में संघर्ष का इतिहास क्या है? कब कौन से आंदोलन हुआ? उनका नतीजा क्या हुआ? क्या शांति समझौते भी हुए?

मणिपुर में संघर्ष का इतिहास 
मणिपुर की घाटियों और पहाड़ियों में रहने वाले 35 से अधिक समुदाय हैं। राज्य में नगा और कुकी जनजातियों सहित विभिन्न समुदायों और विभिन्न विद्रोही समूहों के बीच संघर्ष का एक लंबा इतिहास रहा है। नगा विद्रोही समूह, NSCN-IM, पूर्वोत्तर भारत में नगा-बसे हुए क्षेत्रों के एकीकरण की मांग कर रहा है। दूसरी ओर कुकी औपनिवेशिक शासन के समय से ही अपने अधिकारों और क्षेत्र के लिए लड़ रहे हैं। इसी तरह का टकराव अन्य समूहों में भी हो चुका है।

50 के दशक के शुरू हुई अशांति 
आजादी के बाद से ही मणिपुर ने उग्रवाद के अनेक जख्म झेले हैं। विशेष रूप से 50 के दशक के अंत से विद्रोही समूहों की लड़ाई ने राज्य को अशांत करना शुरू कर दिया। इस दौरान नगा राष्ट्रीय आंदोलन और एक स्वतंत्र नगालिम क्षेत्र के लिए लड़ाई से मणिपुर के कई हिस्सों हिंसा की चपेट में आ गए। 

जब यह आंदोलन उग्र था, मणिपुर में बहुसंख्यक मैतेई समुदाय मणिपुरी राजा महाराजा बोधचंद्र और भारत सरकार के बीच विलय समझौते का विरोध कर रहा था। 1997 में विद्रोही गुट नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम या एनएससीएन (आई-एम) ने भारत सरकार के साथ युद्धविराम समझौता किया था। 

1964 में बने यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (UNLF) ने भारत से अलग होने की मांग की। इसके बाद पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ कांगलेपाक (PREPAK) और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) जैसे कई मैतेई विद्रोही समूह और घाटी विद्रोही समूह अस्तित्व में आए। इन गुटों के दो उद्देश्य हुआ करते थे: पहला भारत से आजादी और दूसरा नगा विद्रोही समूहों को खदेड़ना।

कुकी-जोमी समूह का उदय वास्तव में कुकी के खिलाफ नगा हमले की जवाब के रूप में हुआ था। आरोपों के मुताबिक, 1993 में एनएससीएन-आईएम ने कुकी के एक नरसंहार को अंजाम दिया। इसमें हजारों कुकी को बेघर हो गए। इसके बाद कुकी-जोमी जनजातियों ने कई सशस्त्र समूह बना लिए। लगभग उसी समय, मैतेई और मैतेई पंगल (मुस्लिम) के बीच इसी तरह की झड़पें हो रही थीं। इसने कई अन्य लोगों के साथ मिलकर इस्लामिक गुट समूह पीपुल्स यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट बनाया। हालांकि, ये गुट अब इस क्षेत्र में सक्रिय नहीं है।

Manipur Violence: कुकी समुदाय से मिलते सेना के जवान - फोटो : Amar Ujala
विद्रोह के बीच आया AFSPA कानून 
भारत सरकार ने अलगाववादी गतिविधि की प्रतिक्रिया में 1958 में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) बनाया। शुरू में इसे नगालैंड और मणिपुर के कुछ हिस्सों में लागू किया। बाद में इस अधिनियम को पूरे राज्य में लागू कर दिया गया।

1980 के दशक में मणिपुर में स्थिति और बिगड़ गई तब राज्य को अशांत क्षेत्र घोषित किया गया था। 2008 में केंद्र, राज्य और कुकी-जोमी समूहों के बीच त्रिपक्षीय सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन (SOO) समझौते के जरिए शांति वार्ता हुई।

जैसे-जैसे कानून-व्यवस्था की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हुआ, AFSPA को कई क्षेत्रों से हटा दिया गया। हालांकि, घाटी के विद्रोही समूहों ने न कभी भी केंद्र के साथ कोई समझौता किया है न ही किसी शांति वार्ता में भाग नहीं लिया है। ये गुट आज भी सक्रिय हैं।

कुकी-जोमी विद्रोही समूह
कुकी-जोमी आंदोलन अन्य गुटों की आक्रामकता के खिलाफ रक्षा के रूप में शुरू हुआ, लेकिन जल्द ही अलग कुकीलैंड की मांग में बदल गया। इन गुटों ने भारत, म्यांमार और बांग्लादेश के कुकी-जोमी बसे हुए क्षेत्रों में फैले हुए एक काल्पनिक देश को 'कुकीलैंड' कहना शुरू कर दिया था। समय के साथ, इनकी मांग एक अलग राज्य के रूप में बदल गई।

मणिपुर हिंसा - फोटो : ANI
ये हैं प्रमुख गुट 
मणिपुर में चुराचांदपुर सबसे प्रभावित जिला है। यहां अभी भी 20 से ज्यादा उग्रवादी गुट सक्रिय हैं। क्षेत्र के प्रमुख समूहों में कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन और इसकी सशस्त्र शाखा कुकी रिवोल्यूशनरी आर्मी, जोमी री-यूनिफिकेशन ऑर्गनाइजेशन, जोमी रिवोल्यूशनरी आर्मी, कुकी नेशनल फ्रंट, कुकी नेशनल लिबरेशन फ्रंट, यूनाइटेड कुकी लिबरेशन फ्रंट और कुकी नेशनल आर्मी शामिल हैं। 

वहीं, घाटी के विद्रोही गुटों में से यूएनएलएफ अब तक सबसे शक्तिशाली बना रहा। घाटी के समूहों ने छिटपुट रूप से सुरक्षा बलों के खिलाफ घात लगाकर हमला किया और आईईडी लगाए। केसीपी और केवाईकेएल जैसे अन्य शक्तिशाली समूह समय के साथ उभरे। ये अब बर्मी क्षेत्र में स्थापित शिविरों में सक्रिय हैं।

बीते कुछ वर्षों में घाटी समूह कमजोर हुए हैं। यूएनएलएफ अब अपने सबसे कमजोर स्तर पर है, जो आंतरिक कलह के कारण तीन गुटों में बंट गया है। नगा समूहों में एनएससीएन-आईएम सबसे प्रमुख है, जिसका आधार उखरुल और सेनापति जिलों में है।

इन मांगों को लेकर भिड़ते रहे गुट 
NSCN-आईएम: एनएससीएनआईएम की प्रमुख मांग पूर्वोत्तर के नगा बहुल क्षेत्रों का एकीकरण है जो केंद्र के साथ शांति वार्ता कर रहा है। 2001 में भारत सरकार और एनएससीएन आईएम के बीच हुए संघर्ष विराम समझौते को बढ़ाया गया था।

नगा-कूकी लड़ाई
कुकी पहाड़ी जनजातियां हैं जो म्यांमार के बगल में पूर्वोत्तर में और बांग्लादेश में चटगांव पहाड़ी इलाकों में फैली हुई हैं। 13 सितंबर, 1993 को नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (इसाक मुइवा) के उग्रवादियों ने मणिपुर की पहाड़ियों में लगभग 115 कुकी नागरिकों का नरसंहार किया। हालांकि, एनएससीएन-आईएम ने आरोप का खंडन किया।

नगाओं और कुकी के बीच संघर्ष आजादी से पहले शुरू हो गया था। 1990 में जमीन को लेकर लड़ाई हुई। कुकियों ने अक्सर दावा किया कि उनके 350 गांव उजाड़ दिए गए, 1,000 से अधिक मारे गए और 10,000 लोग विस्थापित हुए। 
 
मैतेई पंगल और मैतेई
1993 में मैतेई पंगल (मुस्लिम) और मैतेई के बीच झड़पें हुईं। मुस्लिम यात्रियों को ले जा रही एक बस में आग लगा दी गई। 100 से ज्यादा लोग मारे गए थे।
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मणिपुर के लोगों ने हिंसा के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया। - फोटो : PTI
मैतेई और आदिवासी समूहों के बीच हालिया संघर्ष 
राज्य में मैतेई समुदाय के लोगों की संख्या करीब 60 प्रतिशत है। ये समुदाय इंफाल घाटी और उसके आसपास के इलाकों में बसा हुआ है। समुदाय का कहना रहा है कि राज्य में म्यांमार और बांग्लादेश के अवैध घुसपैठियों की वजह से उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। 

वहीं, मौजूदा कानून के तहत उन्हें राज्य के पहाड़ी इलाकों में बसने की इजाजत नहीं है। यही वजह है कि मैतेई समुदाय ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर उन्हें जनजातीय वर्ग में शामिल करने की गुहार लगाई थी। अदालत में याचिकाकर्ता ने कहा कि 1949 में मणिपुर की रियासत के भारत संघ में विलय से पहले मैतेई समुदाय को एक जनजाति के रूप में मान्यता थी। 

इसी याचिका पर बीती 19 अप्रैल को हाईकोर्ट ने अपना फैसले सुनाया। इसमें कहा गया कि सरकार को मैतेई समुदाय को जनजातीय वर्ग में शामिल करने पर विचार करना चाहिए। साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को इसके लिए चार हफ्ते का समय दिया। अब इसी फैसले के विरोध में मणिपुर में हिंसा हो रही है।
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