फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

शिक्षा का भगवाकरण!: पाठ्य पुस्तकों में मुगलों के योगदान को सीमित करने पर उठे सवाल, सही इतिहास पढ़ना जरूरी क्यों?

अमित शर्मा
Updated Tue, 26 Apr 2022 07:13 PM IST

सार

प्रोफेसर जयप्रकाश वर्मा उदाहरण के तौर पर बताते हैं कि आज हमें बताया जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय को बख्तियार खिलजी ने 1199 ईसवी में आग के हवाले कर दिया था।  लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि बख्तियार खिलजी एक आक्रमणकारी लुटेरा था। वह धन लूटने के लिए भारत आया था। उसका पुस्तकों से क्या वास्ता?
विज्ञापन
विज्ञापन
मुगल इतिहास - फोटो : Agency (File Photo)


लेकिन इतिहास पढ़ते समय हमें सभी तथ्यों-पक्षों को समझने की कोशिश करनी चाहिए, जिससे हम घटना की सच्चाई तक पहुंच सकें। इस दृष्टि से विद्यार्थियों के सामने सभी दृष्टिकोण तथ्यों के साथ पेश किया जाना चाहिए, जिस पर चिंतन कर वे सही निष्कर्ष तक पहुंच सकें।


प्रोफेसर जयप्रकाश वर्मा उदाहरण के तौर पर बताते हैं कि आज हमें बताया जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय को बख्तियार खिलजी ने 1199 ईसवी में आग के हवाले कर दिया था। इसमें बौद्ध और आयुर्वेद पर लिखी लाखों पुस्तकें तीन महीने से ज्यादा समय तक जलती रहीं। लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि बख्तियार खिलजी एक आक्रमणकारी लुटेरा था। वह धन लूटने के लिए भारत आया था। उसका पुस्तकों से क्या वास्ता? खिलजी को पुस्तकों को जलाने में भला क्या रुचि हो सकती थी?


यह ठीक वही काल था जब सनातन धर्म के कुछ लोगों को बौद्ध धर्म से अपने ऊपर खतरा महसूस हो रहा था। वे जगह-जगह बौद्ध धर्मावलंबियों का विरोध कर रहे थे। कुछ इतिहासकारों का मत है कि बौद्ध धर्म की पुस्तकों को जलाकर उनका इतिहास नष्ट करने की कोशिश इस धर्म विशेष के कुछ लोगों द्वारा ही की गई थी, जबकि इसका आरोप खिलजी पर मढ़ दिया गया। उन्होंने कहा कि इस तरह किसी इतिहास का अध्ययन करते समय समकालीन समाज का पूर्ण अध्ययन हमें घटना को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकता है।

संस्कृत की प्राचीनता पर भी प्रश्न

उन्होंने कहा कि इसी तरह संस्कृत को सबसे पुरानी भाषा के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, लेकिन यह समझने की कोशिश की जानी चाहिए कि सम्राट अशोक के शिलालेखों तक कहीं संस्कृत भाषा दिखाई नहीं पड़ती। इसका सबसे पहला प्रामाणिक साक्ष्य जूनागढ़ अभिलेख में दिखाई पड़ता है, जो दावे के विपरीत बहुत बाद के समय का है। ऐसे में संस्कृत की प्राचीनता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े होते हैं। इसीलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए इतिहास को समग्रता के साथ पढ़ा जाना चाहिए और सरकारों का दायित्व है कि वे विद्यार्थियों के सामने संपूर्ण तथ्य रखें।  

हिंदू-मुस्लिम एकता

सांप्रदायिकता फैलाने और भारत के विभाजन का दोष अकसर मुसलमानों के सिर मढ़ दिया जाता है। लेकिन इस बात को ध्यान रखना चाहिए कि आधुनिक इतिहास में 1857 तक हिंदू-मुस्लिम विवाद की कोई बड़ी घटना नहीं घटी थी। हिंदू-मुस्लिम सभी साथ मिलकर रह रहे थे और आजादी के आंदोलन में अपनी भूमिका निभा रहे थे। 1857 की क्रांति की सफलता के बाद ही अंग्रेजों को लगने लगा था कि यदि इस तरह का कोई और विद्रोह हुआ तो भारत पर शासन करना मुश्किल हो जाएगा।



ऐसे में जब 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई और इसके नीचे हिंदू-मुस्लिम सभी इकट्ठे होने लगे, तब अंग्रेजों को अपने साम्राज्य पर खतरा महसूस होने लगा। इसके बाद ही उन्होंने एक साजिश के तहत मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश शुरू कर दी। मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने के लिए अंग्रेजों ने उन्हें अलग देश का सपना दिखाना शुरू कर दिया। इसके लिए पूरी रणनीति के साथ खुलकर पक्षपात भी किया जाने लगा जिससे हिंदुओं के मन में उनके प्रति द्वेष पैदा हो सके।

सरकार की मंशा पर सवाल    

राजधानी कॉलेज, दिल्ली में एसोसिएट प्रोफेसर सिद्धेश्वर शुक्ला ने अमर उजाला से कहा कि इतिहास बेहद संवेदनशील विषय होता है। वर्तमान की किसी समस्या का हल खोजने के लिए हमें उसके इतिहास को बेहद बारीकी से समझना जरूरी होता है। इतिहास हमें इसी काम में मदद करता है। यही कारण है कि इतिहास के तथ्यों को बेहद सावधानी के साथ रखा और पढ़ा जाना चाहिए।



उन्होंने कहा कि मुगलकाल में भारत में भव्य निर्माण हुए। यह केवल तभी हो सकता था जब देश आर्थिक तौर पर बेहद मजबूत हो। इससे यह साबित होता है कि मुगलकाल में भारत की आर्थिक स्थिति पश्चिम के आज के विकसित देशों से कहीं ज्यादा बेहतर थी। उन्होंने कहा कि केवल सीबीएसई के सिलेबस से हटा देने से मुगलों का योगदान भारत के इतिहास से गायब नहीं किया जा सकता।

नए तथ्यों से नए इतिहास का निर्माण

प्रोफेसर कपिल कुमार कहते हैं कि इतिहास तथ्यों के आधार पर चलता है। किसी भी घटना के संदर्भ में नया तथ्य सामने आने पर पूरे इतिहास का संदर्भ बदल जाता है। विभिन्न कारणों से कई बार इतिहास के तथ्य भी लोगों के सामने नहीं आने दिए जाते। लेकिन बदली परिस्थितियों में उन तथ्यों को जनता के सामने लाया जाना आवश्यक है।



नेताजी के जीवन के कई रहस्यों से पर्दा हटाती पुस्तक 'नेताजी, आजाद हिंद सरकार एंड फौज, रिमूविंग स्मोक स्क्रींस 1942-47' के लेखक प्रो. कपिल कुमार के अनुसार, सुभाष चंद्र बोस ने जापान सरकार के साथ यह समझौता किया था कि उनकी आजाद हिंद फौज अंग्रेजों से जो भी इलाके जीतेगी, उन पर जापान का कब्जा नहीं होगा, बल्कि उन पर आजाद हिंद फौज के अधिकारी शासन करेंगे।
विज्ञापन


सुभाष चंद्र बोस ने अपनी फौज के 91 सिपाहियों को आज के परमवीर चक्र मेडल की तरह ‘तमगा-ए-हिंद’ जैसी अनेक उपाधियां दी थीं, लेकिन उनका आरोप है कि इन सिपाहियों के इस इतिहास को सामने नहीं लाया गया। अब यह बातें लोगों के सामने दस्तावेज के रूप में उपलब्ध हैं जो भारत के कई कालखंड की नई व्याख्या प्रस्तुत करती हैं।  


इसी प्रकार, 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी का दिवस मनाया जाता है, लेकिन यह बात लोगों के सामने नहीं लाई जाती कि इस दिन केवल सत्ता का हस्तांतरण हुआ था। किंग-VI ने भारत के स्वतंत्र होने के दस्तावेज पर 22 जून 1948 को दस्तखत किए। ऐसे में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस घोषित करने पर भी सवाल खड़ा हो सकता है। लेकिन आज जब लोग अपने देश, इतिहास और नेताओं के बारे में ज्यादा से ज्यादा सही जानकारी पाना चाहते हैं, इन तथ्यों को लोगों के सामने लाया जाना चाहिए।

1857 का सच क्या

प्रो. कपिल कुमार ने कहा कि अंग्रेजों ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को एक ‘सैनिक विद्रोह’ कह कर कमतर करके दिखाने की कोशिश की थी। इसे अचानक भड़का विद्रोह बताया गया जो आजादी के बाद भी उसी रूप में पढ़ा-पढ़ाया जाता रहा। लेकिन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कुंवर सिंह ने अपने साथियों को लिखे पत्र में बताया है कि कैसे इसकी तैयारी चार-पांच साल से चल रही थी।



विष्णु गोडसे ने अपनी पुस्तक ‘माजा प्रवास’ में अपनी आंखों से देखी घटनाओं का वर्णन करते हुए लिखा है कि किस तरह ग्वालियर, झांसी, चित्रकूट में स्वतंत्रता संग्राम की तैयारियां चल रही थीं। लेकिन अब तक इस तथ्य को लोगों के सामने नहीं लाया गया। अब इन पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए।

और पढ़ें...
विज्ञापन
विज्ञापन
Next