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क्या है देवबंद का इतिहास और कितना संभव है उसका नाम बदलना?

Sat, 18 Mar 2017 12:53 PM IST
amarujala.com- Written by : हरेन्द्र सिंह मोरल
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इस्लामी मरकज की शीर्ष संस्‍था दारुल उलूम के शहर देवबंद का नाम एक बार फिर चर्चा में है लेकिन इस बार चर्चा दारुल उलूम की वजह से नहीं खुद उस शहर के नाम की वजह से है जिसे जितना सम्मान मुस्लिमों में मिला उतना ही हिंदुओं में भी। वेस्ट यूपी के सहारनपुर जिले का देवबंद ऐसा शहर माना जाता है जिस पर हिंदू और मुस्लिम दोनों समानता से अपना अधिकार जताते हैं।
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इसी अधिकार के साथ शहर से भाजपा के नवनियुक्त सांसद कुंवर ब्रजेश सिंह ने देवबंद शहर नाम बदलने का मद्दा उछाल दिया है। यह मुद्दा ऐसा है जिसने एकदम तो आग नहीं पकड़ी लेकिन इसकी चिंगारी आने वाले समय में भाजपा की मुश्किलें जरूर बढ़ा सकती है।

ब्रजेश सिंह कहते हैं कि उन्होंने कोई नया काम नहीं किया वो तो केवल क्षेत्र के लोगों की भावनाओं को आगे कर रहे हैं जो चाहते हैं कि इस शहर का नाम बदलकर इसके प्राचीन नाम देववृंद पर कर दिया जाए। हालांकि उनके इस दावे का विरोध भी शुरू हो गया है और क्षेत्र के मुसलमानों ने उन्हें नाम बदलवाने की चुनौती भी दे डाली है। ऐसे में जानना जरूरी है कि देवबंद के नाम को लेकर चल रहा विवाद है क्या है देवबंद का इतिहास और क्या था इस कस्बे का पुराना नाम। 
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महाभारतकालीन बताया जाता है देवबंद का इतिहास

सहारनपुर और मुजफ्फरनगर जिले के बीचोबीच बसे देवबंद का इतिहास महाभारतकालीन बताया जाता है। खुद भाजपा विधायक भी दावा कर रहे हैं कि इस शहर में महाराभारत कालीन कई स्‍थान भी हैं जिनमें रणखंडी गांव, पांडु सरोवर और बाला सुंदरी शक्तिपीठ भी है। पांडु सरोवर के बारे में मान्यता है कि यहां पांडवों के बड़े भाई युधि‌ष्टिर और यक्ष के बीच प्रश्न उत्तर हुए थे।

एक लाख की आबादी वाले इस कस्बे में स्थित त्रिपुर बाला सुंदरी पीठ को हिंदुओं के प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल के रूप में माना जाता है जहां हर साल मेला लगता है और लाखों लोग मन्नते मांगने यहां आते हैं। यहां स्थित एक सरोवर की भी बहुत मान्यता है कहा जाता है उसमें स्नान करने मात्र से शरीर के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।

इस मंदिर के द्वार पर लगा शिलालेख प्राचीन काल का कहा जाता है उस पर लिखे गए लेख को आज तक नहीं पढ़ा जा सका है। जैसा की विधायक दावा करते हैं कि इसका पुराना नाम देववृंद था उसको लेकर भी कई किस्से हैं। कोई इसे देवबन कहता है तो कोई देववृंद।

यहां के स्‍थानीय नागरिक बताते हैं कि प्राचीन काल में यह पूरा इलाका घने वनों से घिरा हुआ था उन वनों को लेकर मान्यता थी कि यहां देव निवास करते हैं इसलिए इसे देववन कहा जाता था। जबकि देववृंद के बारे में माना जाता है कि देवों का स्‍थल होने के कारण इसे देववृंद कहा गया है। भाजपा विधायक भी दावा करते हैं कि महाभारत काल के कई प्राचीन अवशेष आज भी यहां हैं और वो इस जगह के देवस्‍थल होने का एहसास कराते हैं।
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दारुल उलूम के कारण दुनिया में प्रसिद्ध हुआ देवबंद

देवबंद को लेकर जितनी मान्यताएं हिंदुओं की हैं उतनी ही मुसलमानों की भी। उसकी बड़ी वजह है मुस्लिमों की शीर्ष धार्मिक और शिक्षण संस्‍था दारुल उलूम। दारुल उलूम का महत्व इसी से जाना जा सकता है कि कई मुस्लिम देशों के राष्ट्राध्यक्ष और शीर्ष धार्मिक नेता यहां आकर इसकी तारीफ कर चुके हैं।

दारुल उलूम को एक पूरी मुस्लिम विचारधारा का जनक माना जाता है जिसके मानने वाले पूरी दुनिया में हैं। 30 मई 1866 में हाजी आबिद हुसैन व मौलाना क़ासिम नानौतवी द्वारा स्‍थापित किए गए दारुल उलूम को शुरूआत में ब्रिटिश हुकुमत की ‌खिलाफत के लिए अस्तित्व में लाया गया था। 1857 के प्रथम गदर को जिस तरह अंग्रेजों ने कुचला था उसके विरोध में एक आवाज बुलंद करने के लिए दारुल उलूम की शुरूआत की गई जो बाद में इस्लामिक शिक्षा के शीर्ष केंद्रों में शुमार हो गया।

इस्लाम की हनफी विचारधारा से प्रभावित दारुल उलूम की विचारधारा को परवान चढ़ाने में मौलाना अशरफ अली थानवी, मौलाना अब्दुल रशीद गंगोही और मौलाना कासिम ननोतवी की अहम भूमिका रही है। मौलाना कासिम ननोतवी ने इस्लामिक ‌‌शिक्षा के इस केंद्र को दुनियाभर में खास पहचान दी।

दारुल उलूम के कारण ही देवबंद शहर में मुस्लिमों का प्रभाव बढ़ा और यह मुस्लिमों के बड़े केंद्र के रूप में प्रसिद्ध हुआ आज भी दुनियाभर के मुसलमानों में देवबंदी विचारधारा सबसे खास मानी जाती है। इस्लामी दुनिया में देवबंदी विचारधारा का बड़ा महत्व है ऐसे में इस शहर का नाम बदलना इतना आसान भी नहीं क्योंकि दारुल उलूम की तो पहचान ही अब इस नाम से बन चुकी है।
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