हिमाचल प्रदेश का विधानसभा चुनाव नया 'पॉलिटिकल ट्रेंड' तय कर सकता है। चुनाव में 'पुरानी पेंशन बहाली' का मुद्दा खूब गर्माया है। कांग्रेस पार्टी ने इसी मुद्दे पर बाजी लगाई है। ये मुद्दा न केवल कांग्रेस, बल्कि भाजपा के लिए भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। भाजपा ने 'ओपीएस' को लेकर हिमाचल में कोई वादा नहीं किया है। इससे पहले उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के चुनाव में भी पार्टी इस जोखिम का सामना कर चुकी है। जब इन दोनों राज्यों में उसे ओपीएस के चलते कोई नुकसान नहीं हुआ, तो कुछ वैसे ही पार्टी ने हिमाचल प्रदेश में दांव खेल दिया है। पार्टी ने पुरानी पेंशन लागू करने को लेकर न तो कोई वादा किया और न ही विचार करने की बात कही। दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी ने इसी मुद्दे पर बाजी लगा दी है। अगर हिमाचल में उसे सफलता मिली तो '2024' के लोकसभा चुनाव में अन्य दलों को अपनी रणनीति में बदलाव लाना पड़ सकता है।
हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के लिए 'ओपीएस' एक अहम मुद्दा रहा है। यूं भी कहा जा सकता है कि पार्टी के लिए यह मुद्दा किसी 'रामबाण' से कम नहीं है। हिमाचल प्रदेश में लगभग हर चौथा व्यक्ति किसी न किसी सरकारी विभाग या निगम की जॉब में कार्यरत है। वहां की राजनीति की दिशा तय करने में कर्मचारियों की बड़ी भूमिका रहती है। वैसे तो सेब उत्पादक और किसान, ये दोनों वर्ग भी राजनीति तौर पर बड़ा कद रखते हैं। इन्हें कोई भी दल नाराज नहीं करना चाहता। प्रदेश के चुनाव में 'ओपीएस' का मुद्दा कितना हावी है, यह अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भाजपा को यहां के चुनाव प्रचार में पूरी ताकत लगानी पड़ी है। पीएम मोदी से लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और दर्जनों केंद्रीय नेता एवं दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री, हिमाचल प्रदेश में पहुंचे हैं।
हिमाचल प्रदेश में पुरानी पेंशन का मसला कई वर्षों से चल रहा है। कांग्रेस पार्टी ने भी समय रहते कर्मियों का मूड भांप लिया था। यही वजह रही कि पार्टी ने इस मुद्दे पर बहुत पहले से ही चुनावी माहौल बनाना शुरू कर दिया था। प्रदेश में 'ओपीएस' इतना ज्यादा गर्माया था कि भाजपा को उसकी काट के लिए पीएम मोदी को सामने लाना पड़ा। दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी के स्टार प्रचारक सोनिया गांधी व राहुल गांधी, चुनाव प्रचार के लिए नहीं आए। पार्टी ने एक इंटरनल सर्वे कराया था। उसमें पुरानी पेंशन के मुद्दे ने कांग्रेस का चेहरा खिला दिया था। रिपोर्ट में सामने आया था कि हिमाचल में कर्मियों का झुकाव कांग्रेस की तरफ हो सकता है। जब ओपीएस के मसले पर सरकारी कर्मियों ने भाजपा सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया, तो कांग्रेस पार्टी की रिपोर्ट और ज्यादा पुख्ता हो गई। भले ही कांग्रेस पार्टी को उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड व पंजाब में इस मुद्दे पर कोई सफलता नहीं मिल सकी, लेकिन उसे हिमाचल में ओपीएस को लेकर बड़ी आस नजर आई।
भाजपा को भरोसा है कि उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड की तर्ज पर उसे हिमाचल में भी डबल इंजन सरकार का फायदा मिलेगा। कुछ लोगों का यह भी कहना था कि सरकारी कमिर्यों को पुरानी पेंशन कहां से दी जाएगी। राज्य पर तो पहले से ही कर्ज का बोझ है। हिमाचल में यह मसला, केंद्र के सहयोग के बिना नहीं सुलझ सकता। भले ही कांग्रेस की राजस्थान और छत्तीसगढ़ सरकार ने पुरानी पेंशन लागू कर दी है, मगर हिमाचल प्रदेश में यह काम उतना आसान नहीं है। कांग्रेस ने वादा तो कर दिया है, लेकिन वह राजस्व कहां से और कैसे जुटेगा, इस बाबत कुछ नहीं बताया है। भाजपा ने संसद तक में यह बात कही है कि केंद्र सरकार, पुरानी पेंशन को लेकर कोई विचार नहीं कर रही। अब हिमाचल प्रदेश में यदि कांग्रेस पार्टी को इस मुद्दे पर सफलता मिलती है तो वह 2024 के लोकसभा चुनाव में भी इसे भुनाने का प्रयास करेगी। चूंकि केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों में भी कर्मचारी एसोसिएशन, ओपीएस का मुद्दा उठा रही हैं। कर्मचारी नेताओं ने तो यहां तक कह दिया है कि केंद्र सरकार ओपीएस को जल्द ही लागू नहीं करती, तो 2024 में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।