विश्व के तीसरे सबसे ज्यादा ऊर्जा की खपत करने वाले देश भारत ने बुधवार को दुनिया को चेताया कि यदि तेल की कीमतें इसी तरह ऊँची बनी रही तो वैश्विक आर्थिक रिकवरी कम होने का खतरा है। इसके साथ ही भारत ने सऊदी अरब और अन्य तेल उत्पादक देशों (OPEC) से आग्रह किया कि वे कीमतें घटाने और आपूर्ति को भरोसेमंद बनाने की दिशा में कदम उठाएं।
भारत में पेट्रोल व डीजल की कीमतें मई के बाद से लगातार बढ़ते हुए रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं। सेरावीक के इंडिया एनर्जी फोरम को संबोधित करते हुए पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि यदि ईंधन की कीमतें उच्च बनी रहीं तो समूची दुनिया में आर्थिक रिकवरी घट जाएगी।
19 से 84 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचे दाम
पिछले साल अप्रैल में कोरोना महामारी के दौरान दुनिया के अधिकांश देशों में लगाए गए लॉकडाउन के कारण मांग घटने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 19 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई थीं। संक्रामक महामारी के खिलाफ पूरी दुनिया में तेजी से टीकाकरण के कारण तेल की मांग में इस साल सुधार आया तो कच्चा तेल चढ़कर 84 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।
तेल आयात बिल 8.8 अरब डॉलर से 24 अरब डॉलर पर पहुंचा
केंद्रीय मंत्री पुरी ने कहा कि इस कारण ईंधन महंगा हो गया और इससे महंगाई बढ़ने की आशंका पैदा हो गई। उन्होंने कहा कि भारत का तेल आयात बिल जून 2020 की तिमाही में 8.8 अरब डॉलर था, जो इस साल बढ़कर 24 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इसकी वजह विश्व बाजार में तेल महंगा होना है। पेट्रोलियम मंत्री ने कहा कि भारत मानता है कि ईंधन की उपलब्धता विश्वसनीय, सस्ती व स्थिर होना चाहिए। विनाशकारी महामारी के बाद आर्थिक रिकवरी कमजोर हो गई है और तेल की उच्च कीमतों के कारण इसे और खतरा पैदा हो गया है।
तेल उत्पादकों को पहुंचेगा नुकसान
भारत अपनी तेल जरूरत का लगभग दो तिहाई हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। इसलिए उसने तेल उत्पादक व निर्यातक देशों यानी ओपेक देशों से आग्रह किया है कि तेल के ऊंचे दामों से वैकल्पिक ईंधन की ओर तेजी से बढ़ना पड़ेगा और ऐसे में ये ऊंचे दाम उत्पादकों को ही नुकसान पहुंचाने वाले साबित होंगे। पुरी ने कहा कि हाल ही में उन्होंने सउदी अरब, यूएई, कुवैत, कतर, अमेरिका, रूस व बहरीन के साथ महंगे ईंधन का मुद्दा उठाया है।
भारत अपनी तेल जरूरत का 85 और गैस जरूरत का 55 फीसदी आयात करता है। यह विश्व का एकमात्र देश है, जहां तेल की खपत में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। भारत के बगैर तेल उत्पादकों पर भी असर पड़ेगा। इसलिए उन्हें परस्पर हितों को देखते हुए तेल के दाम काबू में रखने की रणनीति बनाना चाहिए ताकि खपत, दाम व आपूर्ति का बेहतर संतुलन बना रहे।