फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Bombay High Court: अदालत की जेल अधिकारियों को फटकार, कहा- कैदियों की पैरोल और फरलो में लापरवाही न दिखाएं

Mon, 15 Jul 2024 03:56 PM IST
मिथिलेश नौटियाल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई

सार

Bombay High Court: बॉम्बे हाईकोर्ट ने जेल अधिकारियों द्वारा दोषियों को बार बार पैरोल की अनुमति न देने के तरीके की निंदा की है। अदालत का कहना है कि जेल अधिकारियों द्वारा बार बार मनमाने तरीके से ऐसा किया जा रहा है, जो कि गलत है।

विज्ञापन
बॉम्बे हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने जेल अधिकारियों द्वारा दोषियों को बार बार पैरोल की अनुमति न देने के तरीके की निंदा की है। अदालत का कहना है कि जेल अधिकारियों द्वारा बार बार मनमाने तरीके से ऐसा किया जा रहा है, जो कि गलत है। दरअसल, न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे की पीठ ने पीठ ने 10 जुलाई को एक आदेश दिया था। आदेश में कहा गया था कि दोषी की पैरोल और फरलो का लाभ सिर्फ स्थानीय पुलिस की आपत्ति जताने से नहीं रोका जा सकता। अदालत ने यह भी कहा था कि पुलिस की रिपोर्ट भी कई बार बिना किसी आधार के होती है। 

विज्ञापन


अदालत में तबरेज खान की याचिका पर सुनवाई 
अदालत ने हत्या के मामले में दोषी पाए गए तबरेज खान की याचिका पर सुनवाई के दौरान ये बातें कहीं। दरअसल तबरेज खान ने हाल ही में अपनी फरलो के खिलाफ जेल अधिकारियों द्वारा जारी की गई रिपोर्ट को लेकर अदालत में याचिका दर्ज की थी। उच्च न्यायालय ने जेल अधिकारियों के फैसले को खारिज किया और तबरेज खान को फरलो की अनुमति दी। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि वर्ष 2022 के अगस्त महीने में कारागार विभाग ने एक आदेश जारी किया था। आदेश में जेल अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए थे कि स्थानीय पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर पैरोल को स्वीकर करने से मना न करें। 

कैदियों को फरलो और पैरोल के फायदे मिलने चाहिए- अदालत
मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा, ‘हम कारागार महानिदेशक से उम्मीद करते हैं कि वे अपने ही विभाग के निर्देशों को लेकर जागरूक हैं।’ न्यायालय ने यह भी कहा कि फरलो को स्वीकार न करने का तरीका लापरवाही से भरा था। अदालत ने यह भी कहा कि कारागार तंत्र में पैरोल और फरलो के नियम इसलिए हैं क्योंकि इससे कैदी, अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी पूरा कर सकता है। उच्च न्यायालय ने इस बात पर भी जोर किया कि जो भी अपराधी जेल की सजा काट कर रहे हैं, उन्हें ये फायदे जरूर मिलने चाहिए। 
विज्ञापन


‘कई बार अधिकारियों ने लापरवाही भरा रवैया दिखाया’
न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे की पीठ ने कहा, ‘हमने लगातार यह देखा है कि जेल अधिकारियों ने दोषियों को कारागार से मुक्त करने में लापरवाही भरा रवैया दिखाया है। कई बार यह कहकर आवेदन को रद्द किया जाता कि इससे दोषी फिर से किसी अपराध में शामिल हो सकता है।’ अदालत ने कहा कि ऐसी स्थितियों को संभालने के लिए पर्याप्त कानून हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें