कैप्टन गौर ने कहा, अभी घाटी के हालात उस स्तर पर नहीं पहुंचे हैं कि कोई बाहर से यहां आकर बस जाए। मौजूदा समय में लोग यह बात जानते हैं कि किसी बाहरी व्यक्ति के लिए कश्मीर में जाकर बस जाना आसान नहीं है। स्थानीय सहयोग, समुदाय और प्रशासन, इन सबके हिसाब से वहां रहने लायक हालात नहीं हैं। आतंकवादियों का खतरा कम नहीं हुआ है। जम्मू-कश्मीर के डीजीपी और आर्मी चीफ तक यह बात स्वीकार कर चुके हैं कि अभी घाटी में डेढ़ सौ के आसपास आतंकवादी बचे हैं। बॉर्डर पार भी दो-तीन सौ आतंकी लॉन्चिंग पैड पर मौजूद हैं। ऐसे माहौल में कोई बाहरी आदमी यहां होली-डे होम नहीं बनाएगा। उसे अपना स्थायी आवास भी नहीं बनाना है। वह अपना प्रोजेक्ट, जैसे उद्योग, स्कूल, अस्पताल, पर्यटन या कोई दूसरा व्यवसाय आगे बढ़ाना चाहेगा। उसे ये बात मालूम है कि यहां पर भारी सब्सिडी और दूसरी सुविधाएं सरकार द्वारा मुहैया कराई जाएंगी।
केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन की नई औद्योगिक नीति की घोषणा हो चुकी है। बतौर कैप्टन गौर, जम्मू-कश्मीर प्रशासन यहां पर कम से कम 30-40 हजार करोड़ रुपये का निवेश लाने की योजना बना रहा है। जिन इलाकों में यह निवेश होगा, उनकी पहचान की जा रही है। फिल्म उद्योग, जम्मू-कश्मीर में आए, इसके प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि इन सब योजनाओं में अभी समय लगेगा। सरकार को यहां पर बाहर से आने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। इसके लिए जरूरी है कि सुरक्षा एजेंसियां ओवर ग्राउंड वर्कर और अंडर ग्राउंड वर्करों की पहचान कर उन्हें बाहर निकाले। किसी भी बाहरी व्यक्ति के लिए ये दोनों प्रकार के वर्कर बहुत खतरनाक हैं। यूं कहें कि आतंकियों को सूचना पहुंचाने का ये वर्कर एक बड़ा माध्यम हैं। जब घाटी में आतंकवाद पूरी तरह खत्म हो जाएगा, तभी बाहर के लोग यहां आकर बसने की सोच सकते हैं। तब तक लोग जमीन खरीदेंगे और कहीं दूर बैठकर अपना कारोबार संचालित करेंगे।