बता दें कि सरकार त्वरित सुधारात्मक कदम (पीसीए) की रूपरेखा से लेकर तरलता प्रबंधन तक के मुद्दों पर रिजर्व बैंक से असहमत है। इसी संबंध में सरकार ने रिजर्व बैंक के साथ कुछ मुद्दे पर असहमति को लेकर आज तक कभी भी इस्तेमाल नहीं किए गए अधिकार का जिक्र किया था।
दरअसल सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 7(1) के तहत विभिन्न मुद्दों पर कम से कम तीन पत्र भेजे हैं। यह धारा सरकार को सार्वजनिक हितों के मुद्दों पर केंद्रीय बैंक के गवर्नर को निर्देश जारी करने की शक्ति प्रदान करती है।
बयान में कहा गया है कि भारत सरकार ने कभी उन परामर्शों को सार्वजनिक नहीं किया है। केवल लिए गए अंतिम निर्णय को ही सार्वजनिक किया जाता है। मंत्रालय ने कहा कि सरकार इस परामर्श के जरिये स्थिति के बारे में अपना आकलन सामने रखती है और संभावित समाधानों का सुझाव देती है। सरकार ऐसा करना जारी रखेगी।
पूर्व वित्त मंत्री एवं वरिष्ठ कांग्रेसी नेता पी चिदंबरम ने जारी विवाद को लेकर ट्वीट में कहा कि यदि सरकार ने रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 7 का इस्तेमाल किया तो आने वाले समय में और भी बुरी खबरें सामने आएंगी।
उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती सरकारों ने 1991 में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण, 1997 के एशियाई वित्तीय संकट और 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के समय भी इसका इस्तेमाल नहीं किया था। उन्होंने कहा कि यदि धारा 7 के इस्तेमाल की खबरें सही हैं तो इससे यह पता चलता है कि मौजूदा सरकार अर्थव्यवस्था से जुड़े तथ्यों को छुपाना चाहती है।