केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति को सरकारी नौकरियों में बिना शर्त पदोन्नति में आरक्षण मिलना चाहिए। साथ ही कहा कि सरकार 12 वर्ष पहले पदोन्नति में आरक्षण पर लगाए गए अंकुश को हटाना चाहती है। सरकारी नौकरियों में एससी/एसटी वर्ग को पदोन्नति में 22.5 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए। मामले की अगली सुनवाई 16 अगस्त को होगी।
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि एससी-एसटी समुदाय में पिछड़ापन है। 2006 में एम. नागराज मामले में संविधान पीठ ने कहा था कि सरकार आंख मूंदकर एससी/एसटी वर्ग के कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण नहीं दे सकती। सरकार को इस वर्ग के पिछड़ेपन और अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के आंकड़े जुटाने होंगे। दोनों ही शर्तें सही नहीं हैं।
16 नवंबर, 1992 को इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय पीठ ने पदोन्नति में आरक्षण की इजाजत देते हुए कहा था कि पिछड़ेपन की शर्त एससी/एसटी पर लागू नहीं होती। उनको पिछड़ा ही माना जाता है। नागराज फैसले में लगाई गई शर्तों को हटाया जाना चाहिए। वेणुगोपाल ने कहा कि इस आधार पर 2006 के फैसले पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
अब भी दलितों पर हो रहे अत्याचार, इसलिए आरक्षण जरूरी
अटॉर्नी जनरल ने दलील दी कि कैसे स्थापित किया जा सकेगा कि समुदाय का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है या नहीं? यह पूरे विभाग के लिए होना चाहिए या नहीं? इस पर पीठ ने पूछा कि आखिर अब तक सरकार ने पदोन्नति में एससी/एसटी के प्रतिनिधित्व के आंकड़े जुटाने का प्रयास क्यों नहीं किया? इस पर वेणुगोपाल ने कहा कि 1000 वर्ष के बाद भी समुदाय के लोग समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाए हैं। अब भी उन पर अत्याचार होते हैं, इसलिए पदोन्नति में आरक्षण जरूरी है।