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Constitution: संविधान के मुद्दे पर सियासत के बीच हो रही नई तैयारी, किस तरह मिल रहे नए संकेत

सार

एक प्रयास अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय में भी हुआ था। लेकिन जब तक यह संवैधानिक समीक्षा की रिपोर्ट अपना कोई आकार ले पाती, इसके पहले ही अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिर गई थी। 
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केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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संविधान को लेकर सड़क से संसद तक खूब हंगामा हो रहा है। विपक्ष संविधान बचाओ का नारा दे रहा है तो प्रधानमंत्री हर साल 25 जून को संविधान हत्या दिवस मनाने की घोषणा कर रहे हैं। इस हो- हल्ले के बीच में केन्द्र सरकार देश के संविधान में नए प्रवधान शामिल करने की दिशा में काम कर रही है। कानून मंत्रालय के सचिव राजीव मणि त्रिपाठी ने इसके बाबत विशेषज्ञों से सुझाव लेने की प्रक्रिया तेज कर दी है। विधि एवं कानून मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि ऐसी पहल कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल से मिले संकेत के बाद हो रहे हैं। अमर उजाला को इन विशेषज्ञों में से एक संविधान विशेषज्ञ ने समीक्षा की प्रक्रिया शुरू किए जाने की पुष्टि की और बताया कि जल्द ही वह अपने सुझाव मंत्रालय के अधिकारी के साथ साझा करेंगे।
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पहले भी हुए प्रयास
मंत्रालय के एक अन्य अधिकारी (विधि आयोग) सूत्र के मुताबिक इस तरह का प्रयास अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय में भी हुआ था। लेकिन जब तक यह संवैधानिक समीक्षा की रिपोर्ट अपना कोई आकार ले पाती, इसके पहले ही अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिर गई थी। सूत्र का कहना है कि अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, इंटरनेट, मोबाइल फोन और 5 जी, 6जी का दौर आ गया है। हमने इसे चिह्नित कर लिया और इस दिशा में आगे काम करने की जरूरत है।

2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान बदलने के मुद्दे पर प्रधानमंत्री को देनी पड़ी थी सफाई
एक जून 2024 को आम चुनाव का मतदान संपन्न हुआ। 4 जून को नतीजा आया। विपक्षी दल कांग्रेस ने 99 सीटें प्राप्त की और सत्ता पक्ष भाजपा की सीट 2019 के 303 के मुकाबले घटकर 240 सीट पर आ गई। उत्तर प्रदेश में भाजपा को करारा झटका लगा। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन को जबरदस्त लाभ हुआ। भाजपा के रणनीतिकार इस झटके के लिए प्रधानमंत्री द्वारा दिये गए नारे-अबकी बार 400 पार और विपक्ष द्वारा जनता के बीच में 400 पार के बाद भावी सरकार की संविधान को बदल देने की मंशा वाले दुष्प्रचार को बड़ा कारण मानते हैं।
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विपक्षी इंडिया गठबंधन ने चुनाव प्रचार के दौरान पूरे देश में संविधान में बदलाव की सरकार की मंशा को बड़ा मुद्दा बनाया। कहा कि 400 पार का नारा इसीलिए है, ताकि संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के संविधान को बदला जा सके। यह मामला इतना जोर पकड़ा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खुद इस पर सफाई देनी पड़ी। उन्हें मंच से कहना पड़ा कि बाबा साहब के संविधान को वह नहीं बदल सकते। उनकी सरकार ऐसा सोच भी नहीं सकती।  

शपथ लेते समय राहुल, अखिलेश ने संविधान की कॉपी हाथ में ली और सदस्यों ने कहा जय संविधान
देश में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को आपातकाल की सिफारिश की थी। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद इसे अपनी मंजूरी दी और आपातकाल घोषित हुआ। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत 21 महीने (21 मार्च 1977) तक लगा रहा। दूसरी बार लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने के बाद सभापति ओम बिरला पहली बार आसन से आपातकाल विरुद्ध निंदा प्रस्ताव लाए। विपक्ष ने इसकी तीखी आलोचना की। लोकसभा के  नव निर्वाचित सदस्यों में इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों के सांसदों में संविधान की कॉपी लेकर सदस्यता की शपथ ली। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव समेत अन्य ने संविधान की रक्षा को महत्वपूर्ण लक्ष्य का संदेश दिया। जय संविधान का नारा लगा। दिलचस्प है, सत्ता पक्ष द्वारा इतने साल बाद आपातकाल को बहुत सलीके से याद किया गया। 12 जुलाई को प्रधानमंत्री ने 25 जून को हर साल संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की।

संविधान में अब तक 100 से अधिक संशोधन हो चुके हैं
26 जनवरी 1950 को भारत को गणराज्य के रूप में स्थापित करने वाला संविधान लागू हुआ था। तब से अब तक इसमें 106 संशोधन हो चुके हैं। यह तीन प्रकार के होते हैं। पहले प्रकार के संशोधन में वह संशोधन शामिल हैं, जिन्हें भारत की संसद के प्रत्येक सदन में साधारण बहुमत द्वारा पारित कराया जा सकता है। दूसरे और तीसरे प्रकार का संशोधन अनुच्छेद 368 द्वारा शासित होता है। दूसरे प्रकार के संशोधन में संसद के दोनों सदनों में संशोधन को पारित करने के लिए एक विशेष निर्धारित बहुमत(दो तिहाई) की जरूरत होती है। जबकि तीसरे प्रकार के संशोधन में संसद के सदनों से विशेष प्रकार का बहुमत प्राप्त कर पारित होने होने के बाद उसे अमल में लाने के लिए देश की आधी विधानसभा की मंजूरी मिलना आवश्यक है। इस तरह के अब तब देश में 42 संविधान संशोधन हो चुके हैं।

संविधान बदलने का मुद्दा क्यों गरमाया?
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मई 2014 में देश के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में आए। 2019 के आम चुनाव में उनकी लोकप्रियता ने एक बड़ी छलांग लगाई। 2014 से 2024 तक प्रधानमंत्री का मुख्य ध्यान देश में इतिहास के पुराने मील के पत्थर के स्थान पर नए या बदले हुए मील के पत्थरों को लगाना रहा। देश की नई संसद से लेकर काफी कुछ। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 और अनुच्छेद 35ए का हटाया जाना भी। सीएए, एनआरसी, तीन तलाक जैसे कानून पर सरकार की पहल। इस कड़ी में 01 जुलाई से आईपीसी के स्थान पर भारतीय दंड संहिता(आईपीसी) 1860, सीआरपीसी, भारतीय साक्ष्य अधिनियम1872, दंड प्रक्रिया संहिता(सीआरपीसी)1898 की जगह नए तीन कानून भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम  ने ले ली है।

सरकार ने इसे अंग्रेजों के जमाने के कानून को खत्म करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया था। प्रधानमंत्री ने 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान भी देश को पुराने, अंग्रेजों के जमाने के निरर्थक कानून के बोझ से दबा बताया था। जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रमुख आवाज में देश में एक देश एक विधान की थी। संघ की विचारधारा में भी वर्तन विधान आमूल-चूल परिवर्तन के पक्ष में है। विपक्ष इसी को आधार बनाकर प्रधानमंत्री की मंशा का संकेत देकर सरकार पर सवाल खड़े कर रहा है।
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