सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से एजी ने अपनी दलीलों के समर्थन में अदालत को पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट सौंपनी चाहीं, लेकिन याचिकाकर्ताओं के वकील राजीव धवन ने इसे राजनीतिक दलील कहते हुए इसका विरोध किया। इस पर जम्मू-कश्मीर का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, अनुच्छेद 370 को हटाने को चुनौती देने वाली जम्मू-कश्मीर बार एसोसिएशन के वकील जफर अहमद शाह की अधिकतर दलीलें भी राजनीतिक थीं। ये जो कुछ भी कह रहे हैं, उसका मामले से कोई संबंध नहीं है। अदालत में जम्मू-कश्मीर के अलगाव का समर्थन करने वाली किसी दलील की इजाजत नहीं दी जा सकती। हम गलत को सही करने की कोशिश कर रहे हैं। इस पर धवन ने कहा, पहली बार संविधान के अनुच्छेद 3 का इस्तेमाल करते हुए एक राज्य का दर्जा घटाकर उसे केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया। अगर केंद्र एक राज्य के लिए इसका इस्तेमाल कर सकता है, तो केंद्र किसी भी राज्य के लिए ऐसा कर सकता है।
पुराने फैसले विरोधाभासी, बड़ी बेंच करे सुनवाई
बार की ओर से पेश वकील जफर अहमद शाह ने 1959 के प्रेमनाथ कौल बनाम जम्मू-कश्मीर सरकार और 1970 के संपत प्रकाश बनाम जम्मू-कश्मीर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र किया। उन्होंने कहा, प्रेमनाथ मामले में दिया गया फैसला 25 अक्तूबर, 1947 में दिए गए फैसले से अलग है। इसलिए मामले की सुनवाई पांच सदस्यीय पीठ नहीं कर सकती।
जम्मू-कश्मीर भारतीय संविधान से बाहर नहीं
अटॉर्नी जनरल ने कहा, प्रेमनाथ मामला 370 से जुड़ा नहीं। संपत प्रकाश मामला भी अनुच्छेद 370 कुछ ही प्रावधानों से जुड़ा था। इसलिए मामले को बड़ी बेंच को सौंपने की जरूरत नहीं है। उन्होंने 2017 में संतोष गुप्ता मामले में दिए उस फैसले का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर की संप्रभुता भारत के संविधान के बाहर नहीं है और जम्मू-कश्मीर का संविधान भी कहता था वह भारतीय संविधान के अधीन है।