ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक सूचना के अधिकार के तहत किए जाने वाले आवेदनों को बड़ी संख्या में ‘रद्दी की टोकरी’ में फैंका जा रहा है। सरकारी विभागों द्वारा बड़ी संख्या में आवेदन अस्वीकृत होने से जनता को जनहित से जुड़ी सूचनाएं नहीं मिल पा रही हैं। वहीं आरटीआई कार्यकर्ताओं को कहना है कि सूचना आयुक्तों की कमी से अधिकारियों में अर्थ दंड लगने का डर खत्म हो रहा है।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की जन सूचना अधिकार अधिनियम 2005 पर जारी रिपोर्ट कहती है कि वित्त मंत्रालय को डेढ़ लाख से ज्यादा आरटीआई आवेदन भेजे गए, लेकिन मंत्रालय ने 27 हजार से ज्यादा आवेदनों को सूचना देने के योग्य न मानते हुए अस्वीकृत कर दिया। रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2016-17 में सूचना प्रौद्योगिकी एवं दूरसंचार मंत्रालय ने 1 लाख आवेदनों में से तकरीबन 2800, रेल मंत्रालय ने 99 हजार आवेदनों में से 814 को अस्वीकृत कर दिया। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल ने इस रिपोर्ट को केन्द्रीय सूचना आयोग के आंकड़ों के आधार पर तैयार किया है।
वहीं आरटीआई कार्यकर्ता निखिल डे का कहना है कि लगातार ऐसी शिकायतें मिल रही हैं कि सरकार सूचना के अधिकार कानून को कमजोर करने में जुटी है। उन्होंने बताया कि उनके साथ भी कई बार ऐसा हो चुका है, जब अधिकारियों ने उनके आवेदनों पर जवाब ही नहीं दिया। उनका कहना है कि एक महीने के भीतर जवाब देने की तय समय सीमा के बावजूद आवेदनों को लंबित रखा जा रहा है।
निखिल का कहना है कि इस समय केंद्रीय और राज्यों में सूचना आयुक्तों के कुल 156 पद हैं, लेकिन इसमें से 48 पद लंबे समय से खाली हैं। सरकार जानबूझ कर आयोग के पदों को भर नहीं रही है। वहीं केन्द्रीय सूचना आयोग में भी जल्द ही 4 से ज्यादा खाली होने वाले हैं। उन्होंने बताया कि आयुक्तों के पद खाली होने से केंद्र से लेकर राज्य के सूचना आयोगों में शिकायतों का अंबार लग रहा है। जिसके चलते सूचना देने में आनाकानी करने वाले अफसरों पर आर्थिक दंड भी नहीं लग पा रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक राजनीति में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए आरटीआई कानून को लेकर लंबी लड़ने वाली दिल्ली की केजरीवाल सरकार भी इस मामले में सुस्त दिखाई दी। दिल्ली सरकार के विभिन्न विभागों में 87 हजार से ज्यादा आरटीआई अर्जियां लगाई गईं, लेकिन इनमें से 833 अस्वीकृत कर दी गईं। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 18 हजार आवेदनों में से 1806 और प्रधानमंत्री कार्यालय ने 12 हजार आवेदनों में से 1306 को अस्वीकृत करते हुए जवाब देने के योग्य नहीं समझा।