इसे कोई संयोग नहीं कहा जा सकता। यह अमेरिका के रणनीतिकारों की योजना का हिस्सा है। ऑस्टिन जब भारत में थे तो 18 मार्च को चीन में अमेरिकी राजनयिकों का प्रतिनिधिमंडल पहुंचा था। चीन के साथ विभिन्न मुद्दों पर दोनों पक्षों में हॉट टॉक हुआ। चीन के विदेश मंत्री वांग यी, एनएसए यांग जिची, अमेरिका के विदेश मंत्री ब्लिंकेन और एनएसए सुलविन से जमकर उलझे। इसमें चीन ने खुलकर अमेरिका के अपने विरुद्ध प्रयासों और मुद्दों पर चर्चा की। चीन के राजनयिकों ने साफ किया कि अमेरिका के इस निरर्थक दबाव के आगे उनका देश अपना नजरिया नहीं बदलेगा। अमेरिका ने भी तिब्बत, हांगकांग समेत चीन को चुभने वाले मुद्दों पर खुलकर अपना प्रयास जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई। एक तरह से देखा जाए तो यह अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को जो बाइडन प्रशासन द्वारा जारी रखने का प्रयास है।
अमेरिका ने इसके बहाने दुनिया को संदेश दिया है कि वह चीन के खिलाफ खुलकर मैदान में आ गया है और चीन को आगे बढ़ने से रोक चाहता है। कूटनीति, अर्थ नीति, व्यापार नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को समझने वालों का कहना है कि अमेरिका चीन के साथ एक झटके में किसी संबंध को खत्म कर लेने की स्थिति में नहीं है। उसे चीन के इंजीनियरों समेत तमाम क्षेत्रों में आपसी सहयोग की आवश्यकता है। इधर, चीन को भी अमेरिका की जरूरत है लेकिन चीन जहां अब अमेरिका से बराबरी करने में लगा है, वहीं अमेरिका चीन के रास्ते में रोड़ा बन रहा है। इसलिए बहुत जल्दबाजी में कोई नतीजा निकाल लेना अच्छा नहीं रहेगा। अभी अमेरिका जो कर रहा है, उसका उद्देश्य दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद प्रशांत महासागर तक अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करना है।
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के माउथ पीस माने जाते हैं। लावरोव ने कुछ महीने पहले भारत के संबंध में बयान देकर कहा था कि वह (भारत) चीन विरोधी गुट के प्रयास में उलझ रहा है। लावरोव के इस बयान को तब कूटनीति के जानकारों ने बड़ी गंभीरता से लिया था। यह चीन, पाकिस्तान, ईरान के गहराते संबंध की तरफ इशारा कर रहा था। इसका सीधा अर्थ है कि भारत और रूस के बीच में दूरी का बढ़ना, अमेरिका के निकट आना और अफगानिस्तान पर टिकी चीन, रूस, ईरान की निगाह। अंदरखाने में भारत के रणनीतिकार बदल रहे परिदृश्य को साफ समझ रहे थे। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की अचानक अफगानिस्तान यात्रा, पाकिस्तान के साथ संबंध का संकेत देना और अफगानिस्तान वार्ता में भारत को हिस्सा बनाना इसी का हिस्सा था।
पूर्व विदेश सचिव शशांक, विदेश और खासकर दक्षिण एशिया के मामले को गहराई से समझने वाले प्रो. सुखदेव मुनि या फिर रक्षा और सामरिक रणनीति, विदेश नीति पर निगाह रखने वाले सेना से रिटायर मेजर जनरल अशोक मेहता इसे बड़ी भूल सुधार मान रहे हैं। कुछ राजनयिकों का कहना है कि अपने क्षेत्रीय, अंतरराष्ट्रीय और सामरिक हितों को देखते हुए भारत को चीन विरोधी गुट के साथ खुलकर खड़े होने का निर्णय संवेदनशील होकर लेना चाहिए। रूस के साथ संतुलित रिश्ते की अभी भी जरूरत है। मध्य एशिया तक भारत को पहुंचाने के अपने रास्ते बंद नहीं करने चाहिए और यह रास्ता अफगानिस्तान के साथ हितों के सधने के बाद संभव है।
अमेरिका और जो बाइडन प्रशासन लगातार भारत और पाकिस्तान में संवाद की शुरुआत कराने का श्रेय ले रहा है। भारत के कुछ जानकारों को इससे कुछ रिश्ते सुधरने की उम्मीद भी दिखाई दे रही है। अमेरिका के साथ कई बड़े रक्षा समझौते हो चुके हैं। अब इसे आगे बढ़ाने की जरूरत है। अभी इस बारे में लॉयड ऑस्टिन ने कुछ खास नहीं कहा है। वह काट्सा (काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट) के बारे में भी कुछ नहीं बोले।
एक अनुमान है कि एनएसए डोभाल से उनकी भारत के सामने आसन्न बड़ी चुनौती पर वार्ता हुई होगी। रक्षा मंत्री से भविष्य के सहयोग पर विमर्श हुआ होगा। चर्चा में पाकिस्तान और चीन से जुड़े मुद्दे भी रहे ही होंगे। कूटनीति के जानकार कहते हैं कि संवाद बंद होते ही सभी रास्ते बंद हो जाते हैं। इसलिए पाकिस्तान के साथ जो पिछले चार-पांच साल से कर रहे थे, ऐसा नहीं होना चाहिए। भारत को पहले की तरह पड़ोसी नीति को संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ाते रहना चाहिए।