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FRCV: भारतीय सेना को क्यों चाहिए यह फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल; क्या होगा पुराने रूसी टी-72 टैंकों का?

हरेंद्र चौधरी
Updated Thu, 05 Sep 2024 02:13 PM IST

सार

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल एबी शिवाने ने बताया कि भारतीय सेना के पास इस समय रूस से खरीदे हुए लगभग 1800 टी-72 टैंक हैं, जो 1979 से सेवा में हैं। वहीं, 2030 तक एफआरसीवी भी सेना में शामिल होना शुरू हो जाएगा, जिसके बाद इन टी-72 टैंकों को सेवा से बाहर करने की शुरुआत की जाएगी।
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FRCV - फोटो : Amar Ujala


35 से 45 वर्षों तक सेवा में रहेगा FRCV 

रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा, "टैंक बेड़े के आधुनिकीकरण के लिए, एफआरसीवी की खरीद के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है। FRCV अगले 35 से 45 वर्षों तक सेवा में रहेगा और इसलिए इसे इस तरह से डिजाइन किया जाना चाहिए कि युद्ध के मैदान में ये न केवल दुश्मन पर जबरदस्त प्रहार करे, बल्कि इस पर मिसाइलों के हमलों का भी असर न हो औऱ लंबे समय तक युद्ध के मैदान में टिका रहे। साथ ही, अगली पीढ़ी की ऑपरेशनल कैपेबिलिटीज और ऑटोमेशन को देखते हुए इसमें पूरी तरह से डिजिटल डेटा बैकबोन आर्किटेक्चर को भी जोड़ा चाहिए।''


60 टन से ज़्यादा नहीं होगा वजन

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल एबी शिवाने ने बताया कि भारतीय सेना के पास इस समय रूस से खरीदे हुए लगभग 1800 टी-72 टैंक हैं, जो 1979 से सेवा में हैं। वहीं, 2030 तक एफआरसीवी भी सेना में शामिल होना शुरू हो जाएगा, जिसके बाद इन टी-72 टैंकों को सेवा से बाहर करने की शुरुआत की जाएगी। उन्होंने संभावना जताई कि FRCV साल 2045 तक शेष T-72 बेड़े की जगह ले लेगा। उन्होंने बताया कि डीजीएमएफ ने इसके लिए कई टेक्निकल पैरामीटर्स को लिस्ट किया है। इसका वजन 55+/-10% के साथ हाई-पावर टू-वेट रेशियो 27:1 एचपी/टन होगा। कुल मिला कर इसका वजन 60 टन से ज़्यादा नहीं होगा। वहीं इसमें चालक दल के चार लोगों के बैठने की जगह होगी। उन्होंने बताया कि टी-72 को टी-90 से भी रिप्लेस किया गया है। सेना ने लगभग 1,200 टी-90एस 'भीष्म' टैंकों को शामिल किया है। वहीं, इस साल, 118 स्वदेशी अर्जुन मार्क-1ए टैंकों में से पहले पांच को शामिल करेगी। 


लेफ्टिनेंट जनरल एबी शिवाने के मुताबिक भारतीय सेना ने पहली बार 2015 में रिक्वेस्ट फॉर इनफॉरमेशन (आरएफआई) जारी किया था। शुरुआत में इसे स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप मॉडल (एसपीएम) के तहत रखा जाना था। हालांकि, एसपीएम के सामने आने वाली चुनौतियों को देखते हुए सेना ने इसे मेक-I कैटेगरी के तहत आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। जिसके बाद 2015 से सर्विस हेडक्वॉटर्स की तरफ से कई आरएफआई जारी किए गए, जो 2024 में अंतिम चरण में है।  


3-4 सालों में बन कर तैयार हो जाएगा प्रोटोटाइप

रक्षा सूत्रों ने बताया कि एफआरसीवी को तीन चरणों में शामिल किए जाने की उम्मीद है। एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (एओएन) के बाद, सेना अब एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट (ईओआई) जारी करेगी, जिसमें वह वह बताएगी कि उसे किस तरह की टेक्नोलॉजी और स्पेसिफिकेशंस इस टैंक में चाहिए। जिसके बाद इसे बनाने की इच्छुक कंपनियां अपना इंट्रेस्ट जाहिर करेंगी। सूत्रों ने बताया कि फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल्स बनाने के लिए दो कंपनियों ने अभी तक रूचि दिखाई है, इनमें भारत फोर्ज और लार्सेन एंड टुब्रो शामिल हैं। तीनों चरणों के प्रत्येक फेज में 600 FRCV बनाए जाएंगे। रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (डीएपी) के अनुसार, पूरी प्रक्रिया में 98 सप्ताह (या लगभग 2 वर्ष) का समय लगेगा। वहीं एओएन मिलने के बाद, इस प्रक्रिया को पूरा होने में लगभग 6-8 महीने और लगेंगे। योजना के अनुसार, चयनित कंपनियां पहले प्रोटोटाइप बनाएंगी, जिनका ट्रायल किया जाएगा और फिर अंतिम ऑर्डर दिया जाएगा। वहीं, यह ऑर्डर दोनों कंपनियों के बीच बांटा भी जा सकता है। सेना को उम्मीद है कि पहला प्रोटोटाइप अगले 3-4 सालों में बन कर तैयार हो जाएगा। 


रूस-यूक्रेन जंग से भारतीय सेना ने ली ये सीख

सैन्य सूत्रों ने बताया कि भारतीय सेना ने हाल ही में चल रही रूस-यूक्रेन जंग और हमास-इस्राइल जंग से काफी कुछ सीखा है। दो साल से भी लंबे वक्त से जारी रूस-यूक्रेन जंग में टैंकों और आर्मर्ड व्हीकल्स की हालत को देखते हुए FRCV में वह तकनीक लगाई जाएंगी, जो उसे भविष्य के युद्धों के लिए बेहतर बनाएंगी। सूत्रों ने बताया कि फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल एक किले से भी ज्यादा मजबूत होगा। इसमें बारूदी सुरंग का विस्फोट झेलने की क्षमता होगी। वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध में जिस तरह से टैंकों पर ड्रोन हमले हुए हैं, उससे भी भारतीय सेना ने बड़ा सबक लिया है। भारत में जो 1770 FRCV बनाए जाएंगे उसमें ड्रोन हमलों का काउंटर करने की भी क्षमता होगी। वहीं, एंटी टैंक गाइडेड मिसाइलें भी इसका बाल भी बांका नहीं कर पाएंगी। FRCV में मॉड्यूलर ऑर्मर, अत्याधुनिक ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स, वेट्रोनिक्स, नॉन-एक्सप्लोसिव रिएक्टिव ऑर्मर, एक्सप्लोसिव रिएक्टिव ऑर्मर जैसे हथियार भी लगाए जाएंगे। सूत्रों ने यब भी बताया कि यह टैंक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर कैपेबिलिटी के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी से भी लैस होगा।  


जोरावर हो रहा तैयार

इसके अलावा सेना ने एलएसी पर चीन के जेड-15 'ब्लैक पैंथर' का मुकाबला करने के लिए प्रोजेक्ट जोरावर के तहत लगभग 17,500 करोड़ रुपये की लागत से 354 स्वदेशी लाइट टैंक शामिल करने की योजना बनाई है। ये टैंक हाई एल्टीट्यूड इलाकों में होने वाले युद्ध के लिए डिज़ाइन किए गए हैं और इनका वजन भी 25 टन से कम है। भारतीय सेना ने शुरुआत में केवल 59 जोरावर टैंकों का ऑर्डर दिया है। जोरावर टैंक में भारत-फोर्ज की बनाई 105 मिमी की तोप लगाई जा सकती है। अवाडी में कैनन के ट्रायल पूरे होने के बाद जोरावर को चंडीगढ़ ले जाया जाएगा, जहां से उसे न्योमा में माहे फील्ड फायरिंग रेंज में ले जाया जाएगा। न्योमा पूर्वी लद्दाख में एलएसी के पास स्थित है। इस दौरान जोरावर के शून्य से भी नीचे तापमान में हाई एल्टीट्यूड इलाकों में परीक्षण किए जाएंगे। अगर इसके सभी परीक्षण सफल हुए तो जोरावर को 2027 तक सेना में शामिल किया जा सकता है।

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