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Assam: ‘न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिरेक एक समान नहीं’, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने बताया अंतर

Fri, 05 Apr 2024 10:04 PM IST
मिथिलेश नौटियाल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी

सार

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का कहना है कि न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिरेक एक समान नहीं है। उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रणालियों को बदलते समय के अनुसार ढालने की जरूरत है। 

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जस्टिस रंजन गोगोई (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
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विस्तार
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भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) और न्यायिक अतिरेक (Judicial Overreach) के बीच अंतर साफ किया है। उनके अनुसार यह न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि वह कब बदलाव के लिए कार्य करे और कब यथास्थिति बनाए रखे। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि न्यायिक प्रणालियों को बदलते समय के अनुसार ढालने की जरूरत है क्योंकि इसे विश्व स्तर पर मान्यता मिल रही है। 

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न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिरेक में अंतर
दरअसल पूर्व मुख्य न्यायाधीश गौहाटी उच्च न्यायालय के 76वें स्थापना दिवस पर भाषण दे रहे थे। उन्होंने कहा कि 'न्यायिक सक्रियता' और 'न्यायिक अतिरेक' के बीच अंतर काफी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिरेक एक समान नहीं है। उन्होंने कहा कि न्यायिक सक्रियता में फैसले भले ही अच्छे इरादे से किए गए हों लेकिन कभी-कभी ये इरादे अलग परिणामों की ओर ले जाते हैं। जस्टिस गोगोई ने जनहित याचिका की वजह से कानूनी परिदृश्य में आए बदलाव की ओर सभी का ध्यान आकर्षित किया। 

‘दोधारी तलवार की तरह है जनहित याचिका’
पूर्व सीजेआई ने इस बात से भी आगाह किया कि जनहित याचिका (पीआईएल) भी दोधारी तलवार की तरह है। उन्होंने कहा कि एक तरफ पीआईएल पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकार और सरकारी जवाबदेही सहित विभिन्न क्षेत्रों में बदलाव लाने में सहायक रही है। दूसरी ओर जनहित याचिका द्वारा प्रदान की गई व्यापक छूट कभी-कभी न्यायिक अतिरेक के रूप में देखी जा सकती है।
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‘न्यायिक संस्थाएं आशा के गलियारे हैं’
न्यायिक प्रणालियों की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए पूर्व सीजेआई ने कहा कि इस संबंध में तत्काल एक्शन को दुनिया भर में मान्यता दी गई है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र के निरंतर विकास के लिए पर्याप्त संसाधनों और कर्मियों से संपन्न एक न्यायपालिका का होना आवश्यक है। सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा कि समय पर न्याय के अभाव में न्यायपालिका पर जनता का विश्वास कम हो जाता है और कानून का शासन कमजोर हो जाता है। इससे देश की समग्र भलाई प्रभावित होती है। पूर्व सीजेआई ने कहा कि न्यायिक संस्थाएं केवल ईंटों और गारे से नहीं बनी बल्कि ये आशा के गलियारे हैं।

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